
उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत द्वारा 2021 में गांवों में घास की दुकान खोलने का एलान आज तक लागू नहीं हो सका। महिलाओं को जंगलों में घास काटने से मुक्ति दिलाने का दावा कागजों और मंचों तक सीमित रह गया। चार साल बाद भी योजना का कोई ढांचा या लाभार्थी नजर नहीं आता, जिससे सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
- धन सिंह रावत का वादा बना जुमला, गांवों तक नहीं पहुंची योजना
- महिलाओं को राहत देने का दावा, जंगल जाने की मजबूरी आज भी बरकरार
- पैक्ड घास की बातों में उलझी राजनीति, जमीन पर कुछ नहीं
- भाषणों में सुविधा, हकीकत में संघर्ष: घास दुकान योजना पर सवाल
राज शेखर भट्ट
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में वर्ष 2021 में दिया गया स्वास्थ्य एवं कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत का एक बयान आज भी चर्चा और आलोचना का विषय बना हुआ है। 28 अक्टूबर 2021 को एक जनसभा में मंत्री ने यह कहकर सुर्खियाँ बटोरी थीं कि अब गांव की महिलाओं को जंगलों में घास काटने नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि सरकार गैस सिलिंडर और राशन की तरह पैक्ड घास दुकानों में उपलब्ध कराएगी। उस समय इसे ग्रामीण महिलाओं की मुश्किलें कम करने वाला “क्रांतिकारी कदम” बताया गया था, लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद यह एलान कागजों और भाषणों से आगे नहीं बढ़ सका।
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ज़मीन पर हकीकत : योजना गायब : लेकिन सच्चाई यह है कि इस घोषणा के बाद न तो कोई स्पष्ट नीति सामने आई, न बजट में कोई प्रावधान दिखा और न ही किसी विभाग को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। चार साल के करीब समय बीत चुका है, लेकिन उत्तराखंड के किसी भी गांव में “घास की दुकान” का अस्तित्व नजर नहीं आता। न सहकारी समितियों के जरिए, न पशुपालन विभाग के माध्यम से और न ही किसी निजी भागीदारी मॉडल के तहत इस योजना पर काम शुरू हुआ। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि आज भी उन्हें रोज की तरह जंगलों में घास काटने जाना पड़ता है।
धन सिंह रावत ने कहा था कि पहाड़ की महिलाओं को जंगलों में जान जोखिम में डालकर घास काटनी पड़ती है। इससे न केवल उनका समय और श्रम नष्ट होता है, बल्कि वन्यजीवों के हमले और दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। इसी समस्या के समाधान के लिए सरकार पैक्ड घास की व्यवस्था करेगी, जिसे महिलाएं दुकानों से खरीद सकेंगी—ठीक उसी तरह जैसे वे गैस सिलिंडर या राशन लेती हैं। बयान सुनने में आकर्षक था और मंच से तालियाँ भी खूब बजीं। उस वक्त इसे महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने वाली योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हालात जस के तस हैं—ना राहत मिली, ना सुविधा। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह बयान व्यवहारिक कम और राजनीतिक ज्यादा था।
- पहाड़ी क्षेत्रों में पैक्ड घास की आपूर्ति के लिए भंडारण, परिवहन और लागत जैसी कई चुनौतियां हैं।
- घास बेचने की कीमत क्या होगी, यह किस गुणवत्ता की होगी और क्या गरीब महिलाएं इसे खरीद पाएंगी—इन सवालों पर कभी कोई स्पष्टता नहीं दी गई।
- यदि यह योजना गंभीर होती, तो इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट, नीति दस्तावेज और बजटीय घोषणा सामने आती, जो कभी हुई ही नहीं।
जनसभा में किया गया यह एलान उस समय ग्रामीण महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बना था। लेकिन जब वर्षों तक कोई अमल नहीं हुआ, तो यह उम्मीद धीरे-धीरे निराशा में बदल गई। कई महिलाओं का कहना है कि नेताओं के भाषणों में उनकी समस्याओं का जिक्र तो होता है, लेकिन समाधान केवल शब्दों तक सीमित रह जाता है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे एलान केवल भीड़ जुटाने और सुर्खियाँ बटोरने के लिए किए जाते हैं।
यदि सरकार सच में महिलाओं का बोझ कम करना चाहती, तो वन नीति, पशुपालन और ग्रामीण विकास से जुड़ी ठोस योजना बनाकर उसे लागू किया जाता। धन सिंह रावत का “घास की दुकान” वाला बयान आज एक ऐसे वादे के रूप में देखा जा रहा है, जो कभी पूरा नहीं हुआ। यह मामला केवल एक असफल घोषणा का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का उदाहरण है, जहां मंच से बड़े-बड़े एलान कर दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर उनका कोई असर नहीं दिखता।
ग्रामीण महिलाएं आज भी वही कर रही हैं जो वर्षों से करती आ रही हैं—जंगल जाकर घास काटना। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उनके पास एक अधूरा वादा भी है, जो कभी हकीकत नहीं बन पाया।






