
देहरादून। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षाओं से जुड़ा एक और फर्जीवाड़ा सामने आया है। सहकारी निरीक्षक भर्ती परीक्षा से पहले ही एक संदिग्ध अभ्यर्थी की पोल खुल गई। आरोपी ने न केवल फर्जी दस्तावेज लगाए, बल्कि तीन अलग-अलग आवेदन भी किए — तीन मोबाइल नंबर, तीन प्रमाणपत्र, और तीन पते के साथ। जांच में सामने आया कि आरोपी की यह चालाकी उसी की सबसे बड़ी भूल साबित हो गई।
गोपनीय जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी का नाम सुरेंद्र कुमार, निवासी मोडीनगर (गाजियाबाद) है। सुरेंद्र ने तीन अलग-अलग फॉर्म भरे — हर बार पिता का नाम, जन्मतिथि, शैक्षिक योग्यता और जाति प्रमाणपत्र अलग-अलग तरीके से दर्शाए। उसने फर्जी स्थायी प्रमाणपत्र भी लगाया, जिसमें देहरादून का पता लिखा गया था। फर्जीवाड़े की परतें खुलीं तो सामने आया कि सुरेंद्र ने पिता का नाम एक फॉर्म में ‘सालीक’, दूसरे में ‘शालीक’ और तीसरे में ‘सलीक’ लिखा। वहीं, तीनों आवेदन में जन्मतिथि भी अलग-अलग बताई गई — ताकि पहचान का मेल न बैठे।
“यूए” लिखी ID से खुला राज
सुरेंद्र की सबसे बड़ी गलती थी — उसकी फर्जी सेवायोजन आईडी। उसने ID की शुरुआत ‘UA’ से की, जो उत्तर प्रदेश (Uttaranchal काल) के लिए इस्तेमाल होती थी। लेकिन अब राज्य का कोड ‘UK’ (Uttarakhand) है। इसी आईडी में उसने केवल 13 अंक लिखे, जबकि असली आईडी में 16 अंक होते हैं। यही गलती उसे पकड़वाने का सबसे बड़ा सबूत बनी। एसएसपी अजय सिंह ने बताया कि आरोपी के खिलाफ रायपुर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने उसके सभी दस्तावेजों की जांच कर कई विसंगतियां पाई हैं।
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सुरेंद्र ने फर्जी स्थायी प्रमाणपत्र बनवाते समय शासनादेश संख्या भी गलत लिखी। प्रमाणपत्र पर एसडीएम के हस्ताक्षर नहीं थे। उसने दावा किया कि प्रमाणपत्र का आवेदन साल 2001 में किया था, जबकि दस्तावेज 2023 में जारी दिखाया गया। इतना ही नहीं — उसने एक आवेदन में देहरादून का पता, दूसरे में गाजियाबाद का, और तीसरे में हापुड़ जिले का पता दिया। यानी एक ही व्यक्ति तीन जिलों का निवासी बन गया।
तीन साल में तीन विश्वविद्यालयों से स्नातक!
जांच में एक और बड़ा खुलासा हुआ — सुरेंद्र ने अपने ग्रेजुएशन के दस्तावेज भी तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों से एक ही अवधि (2010–2013) के बीच के प्रस्तुत किए। यानी एक ही समय में तीन जगह से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने का दावा किया। उसने इंटरमीडिएट और हाईस्कूल के प्रमाणपत्रों में भी अलग-अलग जन्मतिथि और अलग-अलग परीक्षा वर्ष दर्शाए। सुरेंद्र ने दावा किया कि उसने स्थायी प्रमाणपत्र के लिए आवेदन 2001 में किया था, लेकिन प्रमाणपत्र 2023 में जारी हुआ।
यानी 22 साल बाद! जांच में यह प्रमाणपत्र भी फर्जी पाया गया — न शासनादेश संख्या सही, न हस्ताक्षर मौजूद। गोपनीय जांच रिपोर्ट के बाद सुरेंद्र कुमार के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और सरकारी परीक्षा में धोखेबाजी के आरोपों में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि अब उसकी शैक्षिक संस्थाओं, प्रमाणपत्रों और निवास पतों की क्रॉस वेरिफिकेशन जांच की जा रही है।
फर्जीवाड़ा पकड़ने वाली भूल — “यूए बनाम यूके”
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू रहा सुरेंद्र की “यूए बनाम यूके” वाली भूल। कभी उत्तराखंड का कोड “UA” यानी Uttaranchal हुआ करता था, लेकिन राज्य गठन के बाद 2007 से आधिकारिक कोड “UK” यानी Uttarakhand है। सुरेंद्र ने अपनी इंप्लाई आईडी में “UA” लिख दिया — और यही भूल उसे जेल तक पहुंचाने वाली कुंजी साबित हो सकती है। यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि पेपर लीक और भर्ती फर्जीवाड़े की श्रृंखला में अब भी “चालाक उम्मीदवार” सक्रिय हैं, लेकिन तकनीकी सतर्कता और सूक्ष्म जांच से वे ज्यादा देर तक बच नहीं सकते।





