
यह आलेख एक ऐसे लेखक की यात्रा को रेखांकित करता है, जिसकी कलम ने बाधाओं, ईर्ष्या और विरोध के बावजूद अपनी पहचान बनाई। लेखन को धर्म और साधना मानकर समाज को दिशा देना ही उसकी सच्ची साधना है।
- जब स्कूल की पत्रिका बनी लेखन की पहली सीढ़ी
- ठनठनी लेखनी और समाज से संवाद
- ईर्ष्या, अवरोध और शब्दों की जीत
- लेखन ही कर्म, लेखन ही जीवन
सुनील कुमार माथुर
सुनील को अपने स्कूली जीवन से ही लेखन की प्रेरणा मिल गई। उसके हिन्दी के शिक्षक मदन लाल शर्मा ने विद्यालय की वार्षिक पत्रिका का संपादक जब सुनील को बनाया तो वह दंग रह गया। सुनील ने सफलतापूर्वक विद्यालय की पत्रिका का संपादन किया। बस वहीं से उसकी कलम चल पड़ी। आज वह न केवल अपने शहर का ही श्रेष्ठ साहित्यकार है, अपितु अन्य शहरों व प्रदेशों में भी उसकी लेखनी का डंका बज रहा है।
उसके नियमित लेखन के कारण उसकी लिखी कविताएँ, आलेख, समीक्षाएँ और समाचार विभिन्न समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रतिदिन प्रकाशित होने लगे। इतना ही नहीं, सुनील ऑनलाइन कवि सम्मेलनों में भी कविता पाठ कर अपनी सहभागिता निभाने लगा। वहीं लेखक सम्मेलन व साहित्यकार सम्मेलनों में भी वह सक्रिय रूप से भाग लेने लगा। इससे उसके शहर के कुछ साहित्यकार उससे जलन और ईर्ष्या करने लगे और पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से अनुरोध कर उसके समाचार व रचनाएँ रुकवाने की कोशिश आरंभ कर दी।
इस कारण सुनील द्वारा प्रेषित समाचार व रचनाएँ कुछ संपादकों ने रोकना आरंभ कर दिया। लेकिन सुनील पर तो माँ सरस्वती की अपार कृपा थी। एक दरवाज़ा बंद हुआ तो दूसरा दरवाज़ा खुल गया और उसके समाचार व रचनाएँ पुनः प्रकाशित होने लगीं। उसकी लेखनी में ताकत थी। उसकी लेखनी ठनठनी थी—वह जैसा देखता, वैसा ही लिखता है।
वह अपनी ठनठनी लेखनी के बल पर कहानी, कविता, आलेख, समीक्षाओं और समाचार के माध्यम से अपने विचार जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा है। उसकी लिखी रचनाओं को लोग ध्यान से पढ़ते हैं। यही वजह है कि उसे कभी किताब लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
सुनील का कहना है कि लेखन उसका कर्म है। लेखन ही धर्म है, लेखन ही पूजा है, लेखन ही भगवान है और लेखन ही उसका जीवन है। लेखन ही एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ न जाति है, न धर्म और न ही संप्रदाय। लेखक का केवल एक ही धर्म होता है—समाज को नई दशा और दिशा देना। यही वजह है कि उसने लेखन को कभी व्यवसाय नहीं बनाया। उसका मानना है कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है तो किसी की नकल न करें, बल्कि अपनी प्रतिभा को निखारने पर ध्यान दें।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, (स्वतंत्र लेखक व पत्रकार) जोधपुर, राजस्थान





