
सुनील कुमार माथुर
आज़ादी के समय जो पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती थीं, उनका संपादक मंडल विद्वान् होता था और उन्हें साहित्य सृजन में गहरी रुचि रहती थी। कम कीमत पर वे पाठकों को ढेर सारी पठनीय सामग्री हर रोज़ परोसा करते थे। उस समय के साहित्य सृजनकर्ता भी बहुत अच्छा लिखा करते थे। तब पाठक उन रचनाओं और अंकों का संकलन भी किया करते थे। आज भी वे अंक पुराने पाठकों के पास उपलब्ध हैं, लेकिन समय के साथ-साथ पत्रकारिता और साहित्य सृजन में बदलाव आया।
बदलाव आना भी चाहिए और यह समय की मांग भी है, लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में पत्रकारिता में जो परिवर्तन आया है, वह चिंता का विषय है। आज पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक सामग्री कम और विज्ञापनों की भरमार रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि पाठक समाचार व आलेख नहीं पढ़ रहा, बल्कि विज्ञापन पढ़ने के लिए पत्र-पत्रिकाएं मंगा रहा है। आज पत्रकारिता का पूर्णतया व्यवसायीकरण हो गया है। संपादकीय कार्यालय में जिस कुर्सी पर साहित्य संपादक को बैठना चाहिए, उस कुर्सी-टेबल पर विज्ञापन लाने वाले प्रतिनिधियों ने कब्जा कर रखा है।
आज रिपोर्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस में खाने-पीने और गिफ्ट प्राप्त करने में व्यस्त हैं। विज्ञापन शाखा को साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है। विज्ञापन परिशिष्ट के नाम पर आलेख प्रकाशित करने के भी दाम वसूले जा रहे हैं। संपादकीय विभाग में साहित्यकार-संपादक नदारद हैं। आज पत्र-पत्रिकाएं कंप्यूटर ऑपरेटरों के भरोसे चल रही हैं। उन्होंने जो छाप दिया, सो छप गया—बस कागज़ काले होते रहने चाहिए। नतीजतन, आज साहित्यकार की लेखनी का दम घुट रहा है।
बाजार और जनता-जनार्दन के बीच अपनी लेखनी की साख बनाए रखने के लिए वे कंप्यूटर ऑपरेटरों को चाय-नाश्ता कराकर, किसी तरह उनकी जी-हुज़ूरी कर अपने समाचार और रचनाएं प्रकाशित करा रहे हैं। ऑनलाइन माध्यम में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। समाचार व आलेख टाइप कर भेजने के बावजूद उन्हें प्रकाशित कराने के लिए साहित्यकार गिड़गिड़ाते देखे जा रहे हैं। अगर यही स्थिति रही तो वह दिन भी दूर नहीं जब साहित्यकारों की लेखनी थम जाएगी और साहित्य सृजन की प्रक्रिया पर जंग लग जाएगी।
साहित्य सृजनकर्ता एक श्रेष्ठ विचारक, चिंतक और समाज का सजग प्रहरी होता है। अगर ऐसी स्थिति बनी रही तो वह कब तक इसे सहन करता रहेगा? उसकी लेखनी की भी गरिमा, मर्यादा और इज़्ज़त है। व्यवसायीकरण के इस दौर में वह अपनी लेखनी का निरादर नहीं होने देगा।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान





