
देहरादून। चमोली जिले में भालुओं की लगातार बढ़ती सक्रियता ने ग्रामीण इलाकों में भय और असुरक्षा का माहौल बना दिया है। गोपेश्वर, ज्योतिर्मठ और पोखरी विकासखंड के कई गांवों में भालू आए दिन दिख रहे हैं, जिससे सबसे अधिक प्रभावित स्कूल जाने वाले बच्चे हैं। इन क्षेत्रों में कई किमी लंबे जंगली रास्तों से होकर स्कूल पहुंचने वाले बच्चे अपनी सुरक्षा के लिए सीटियां बजाते हुए और शोर मचाते हुए समूह में चलने को मजबूर हैं, ताकि रास्ते में कहीं भालू हो तो वह दूर हट जाए।
अभिभावकों की चिंता बच्चों के स्कूल जाने और घर लौटने तक बनी रहती है। कई गांवों में तो माता-पिता स्वयं बच्चों को समूह बनाकर स्कूल तक छोड़ने और वापस लाने के लिए जाते हैं, फिर भी भालुओं के डर ने सबका चैन छीन रखा है। दशोली विकासखंड के स्यूंण गांव से जनता इंटर कॉलेज बेमरू जाने वाले बच्चों को लगभग चार से पांच किलोमीटर लंबा जंगली रास्ता पैदल तय करना पड़ता है, जहां भालू कई बार सामने आ चुके हैं।
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ज्योतिर्मठ ब्लॉक के थैंग गांव में स्थिति और भयावह है, जहां भालू अब तक 50 से अधिक मवेशियों को मार चुका है। यहां के हाईस्कूल में धीवाणी, कांडखोला और ग्वाड़ गांवों से आने वाले 20–25 छात्र प्रतिदिन दो किमी लंबे घने जंगल से गुजरकर स्कूल पहुंचते हैं। ग्रामीण महिलाओं, पंचायत प्रतिनिधियों और अभिभावकों का कहना है कि प्राथमिक विद्यालय के छोटे बच्चों को तो वे समूह में छोड़ने जाते हैं, पर बड़े बच्चों की सुरक्षा हमेशा चिंता का विषय बनी रहती है।
पोखरी ब्लॉक में केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग और अलकनंदा भूमि संरक्षण वन प्रभाग की संयुक्त टीमें रात में गश्त कर रही हैं। अधिकारियों के अनुसार ग्रामीणों को भालू संभावित क्षेत्रों में सतर्क रहने, झाड़ियाँ काटने, मिर्च या मार्टिन जलाने जैसे उपाय अपनाने को कहा गया है, ताकि धुएं से भालू दूर रहें। थैंग गांव में लगातार घटनाएं बढ़ने पर विभाग ने दो स्थानीय ग्रामीणों को अस्थायी रूप से नियुक्त किया है जो भालू दिखने की सूचना तुरंत विभाग और गांव वालों को देते हैं।
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इसी बीच उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक के रैथल गांव में एक युवक हरीश कुमार पर भालू ने पानी भरने के दौरान हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल हरीश को पीएचसी और जिला अस्पताल में उपचार देने के बाद हायर सेंटर रेफर किया गया। जनपद में पिछले नौ महीनों में भालुओं के 13 हमले हुए हैं, जिनमें दो महिलाओं की मौत और 12 लोग घायल हो चुके हैं। वन विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद हमले कम नहीं हो रहे हैं। जिला प्रशासन के अनुसार विभाग को डेटलमेंट स्प्रे, एनाइडर और ट्रैप कैमरे लगाने के लिए फंड दिया गया है, लेकिन अभी तक इनका प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा।
ग्रामीणों की लगातार बढ़ती चिंता के बीच प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया है कि वह जंगलों से लगे आबादी वाले क्षेत्रों में अधिक सतर्कता और सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित करे, ताकि स्कूल जाने वाले बच्चों और स्थानीय लोगों की जान किसी भी अनहोनी से सुरक्षित रह सके।





