
सरकार द्वारा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों के बावजूद जमीनी हकीकत में कार्ड आधारित व्यवस्था मरीजों के लिए परेशानी बनती जा रही है। निजी अस्पतालों की मनमानी और मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी प्रक्रियाओं में देरी आमजन के लिए बड़ी समस्या बन चुकी है।
- स्वास्थ्य व्यवस्था में बढ़ती अव्यवस्था
- कार्ड सिस्टम बना मरीजों की मजबूरी
- इलाज से पहले कागजी प्रक्रिया का बोझ
- आमजन की परेशानी और सिस्टम की खामियां
सुनील कुमार माथुर
जन-जन को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना एक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है और उसे बिना किसी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र व बिना किसी भेदभाव के समान स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। आज सरकार ने नाना प्रकार के कार्ड बनाने के लिए जनता को बाध्य कर दिया है और हर तरह के कार्ड में अलग-अलग राशियों की व्यवस्था कर रखी है।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करती है तो यह कार्ड का खेल क्यों खेला जा रहा है? बिना कार्ड उपचार नहीं—यहां तक कि सरकारी अस्पतालों में भी यही स्थिति है। जब सरकार करोड़ों रुपये के विज्ञापन देकर यह दावा करती है कि आमजन को राहत देने के लिए विभिन्न कार्ड योजनाएं शुरू की गई हैं, तो जमीनी स्तर पर मरीजों की हालत और खराब हो रही है।
निजी क्षेत्र के अस्पताल विभिन्न जांचों के बहाने कार्ड की राशि समाप्त कर देते हैं और उपचार के नाम पर मोटी रकम का बिल थमा देते हैं। जब निःशुल्क और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं रोगी को उपलब्ध करानी ही हैं, तो फिर तमाम तरह की कार्ड योजनाओं को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर हर रोगी का बिना भेदभाव अस्पताल में आते ही निःशुल्क उपचार किया जाना चाहिए, चाहे उसमें कितना भी खर्च क्यों न हो।
शर्मनाक बात
यह अत्यंत शर्मनाक है कि जब किसी रोगी की अस्पताल में उपचार के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिजनों को तुरंत मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता। ऑनलाइन प्रक्रिया के नाम पर इसे टाल दिया जाता है, जिसके बाद नगरपालिका या नगर निगम के चक्कर काटने पड़ते हैं। यह प्रक्रिया इतनी जटिल हो गई है मानो किसी राज्य का साम्राज्य हासिल करना हो।
इस देरी के कारण परिजनों को पेंशन, बैंक खाते, मकान, बिजली-पानी आदि के दस्तावेजों में बदलाव कराने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी मौन बने रहते हैं और जनता की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते, जिससे आमजन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सत्ता हासिल करने के बाद अधिकारी, कर्मचारी, नेता और जनप्रतिनिधि केवल अपनी सुख-सुविधाओं और वेतन-भत्तों पर ही ध्यान केंद्रित करते दिखाई देते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच एवं स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुंआ, पालरोड जोधपुर, राजस्थान






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