
यह कविता शीत ऋतु के कोहरे और अंधकार से त्रस्त मानव जीवन की पीड़ा को स्वर देती है। कवि सूर्यदेव से करुण पुकार करता है कि वे अपने प्रकाश से संसार को आलोकित करें और समस्त जीव-जगत को नवजीवन प्रदान करें। कविता में सूर्य को ऊर्जा, आरोग्य और आशा का प्रतीक माना गया है।
- कोहरे में कैद मानव पीड़ा
- सूर्य से करुण पुकार
- प्रकाश और जीवन की कामना
- दिवाकर से नवऊर्जा की प्रार्थना
गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान
अब तो बाहर निकल आओ प्यारे-प्यारे सूरजदेव,
कोहरे की चादर हटाओ दया करो हमारे इष्टदेव।
दुबके बैठे हम सब घर में ओढ़ रजाइयाँ, अधिदेव,
इस अंधकार को नष्ट करो जैसे करते हो सदैव।।
क्यों कठोरता दिखा रहे, हृदय भरा ये हमारे कोप,
घने अंधेरे में उभर रहे मन के ये अक्षर-आलोक।
कर रहे हैं हम सामना इस हानि का मजदूर लोग,
संपूर्ण चराचर को दर्शन दो, पधारो पृथ्वी लोक।।
त्राहि-त्राहि माम मची हुई है, रुक गई स्वप्न उड़ान,
बिना आपके सुनसान है, सूर्य नारायण, ये जहान।
चमक दिखाओ हे दिवाकर, जग करो प्रकाशवान,
संपूर्ण जीव-जंतु बोल रहे, न रही बदन में जान।।
सातों इंद्रियों की शक्ति के सात घोड़े रथ के रूप,
कई रोगों का निवारण तुम बनाते, तुम ही कुरूप।
शिकुड़ रही आज श्वासनली व जिस्म नसें हमारी,
दिव्य ज्योति जग में तुम्हारी, प्रकाश पुंज ये धूप।।
एक क्षण भी ना अब देर करो, दिखाओ तुम तेज,
ग्रहाधिपति कहलाने वाले, ये किरणें जल्दी भेज।
कमल हाथ में करो धारण, कश्यपकुमार यह श्वेत,
रची रचना यह उदय ने, आपके ऊपर एक पेज़।।








