
नवाब मंजूर
कुछ देश,
पहले उकसाते हैं
बहकाते हैं,भटकाते है
देकर सहयोग का आश्वासन
युद्ध कराते हैं
बहकावे उकसावे में आकर
जब कोई देश युद्ध छेड़ देते हैं
तो उकसाने बहकाने वाले ही
सबसे पहले साथ छोड़ देते हैं
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उन्हें अपने हितों की चिंता हो आती है
नफा नुकसान के हिसाब से
आगे पीछे करते हैं
इसी उधेड़बुन में हजारों बेमौत
मरते हैं
फिर
कमजोर टूटा हुआ देश
आत्मसमर्पण करता है
तो फिर वही ताकतें
समझौता करातीं हैं
मेज़ पर ले आतीं हैं
हाथ में हाथ थमातीं हैं!
नेता थामे हाथ में हाथ
कुछ कागजों के साथ
मुस्कुराते हाॅल से बाहर निकलते हैं
लेकिन जिनके लाल
जिनके पिता, पति
भाई बहन निकल लिए
दुनिया से
असंख्य आम नागरिक मरे
उनका क्या?
बरसों बरस आंखों में युद्ध का
खौफनाक मंजर लिए
अपार दुःख सहते हुए
जीने को मजबूर होते हैं
अरे!
युद्ध से पहले ये समझौते
क्यूं नहीं होते हैं?
मारकर,
सबकुछ तबाह कर
क्या मिल जाता है उनको?
यही न !
कागज पर उकेरे कुछ शब्द
जो शहीदों के खून से लिखे
और परिवार वालों के आंसुओं से हैं भींगे होते,
काश!
पिछले युद्धों से कुछ सीखे होते?
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »मो. मंजूर आलम ‘नवाब मंजूरलेखक एवं कविAddress »सलेमपुर, छपरा (बिहार)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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