
राज शेखर भट्ट
देहरादून, उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस की रजत जयंती (25वीं वर्षगांठ) का जश्न मनाने की तैयारियां पूरे प्रदेश में जोरों पर हैं। सड़कों पर बैनर, होर्डिंग और सजावट से सरकार की उपलब्धियों और विकास योजनाओं का प्रचार किया जा रहा है। लेकिन इन्हीं चमकदार पोस्टरों और बधाई संदेशों के नीचे छिपी एक तस्वीर ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है— एक व्यक्ति फुटपाथ पर बेबस और असहाय हालत में सोया हुआ है, और उसके सिर के ऊपर लटका है ‘उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस रजत जयंती’ का विशाल बैनर।
यह तस्वीर राजधानी देहरादून की है, जहां सरकार के मंत्री और जनप्रतिनिधि प्रदेशवासियों को स्थापना दिवस की शुभकामनाएं दे रहे हैं। पोस्टर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अन्य नेताओं के चित्र हैं, जिनमें विकास, आत्मनिर्भरता और समृद्ध उत्तराखंड का सपना दिखाया गया है। लेकिन उसी बैनर के नीचे एक गरीब व्यक्ति फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर है। उसके पास बस एक पुराना बैग है, और तन ढकने के लिए मैले कपड़े। यह दृश्य विकास और वास्तविकता के बीच के अंतर को गहराई से उजागर करता है।
Government Advertisement...
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह दृश्य रोज का है। शहर के कई हिस्सों में मजदूर और बेघर लोग फुटपाथों पर रात बिताते हैं। प्रशासन और सरकार के तमाम दावों के बावजूद इनके लिए न तो कोई स्थायी आश्रय है, न रोजगार की गारंटी। एक राहगीर ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “ऊपर बधाई लिखी है, नीचे बेबसी सो रही है — यही आज के उत्तराखंड की असल तस्वीर है।”
समाचार से संबंधित लिंक – https://www.facebook.com/share/p/1FhMe1pcAw/?mibextid=wwXIfr
तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। कई लोगों ने इसे प्रदेश की सामाजिक विषमता और प्रशासनिक संवेदनहीनता की मिसाल बताया है। सोशल मीडिया पर यूजर्स लिख रहे हैं कि “रजत जयंती का अर्थ केवल सजावट नहीं, बल्कि उस सपने को याद करना होना चाहिए, जिसके लिए उत्तराखंड आंदोलन हुआ था — एक ऐसा राज्य जहां हर नागरिक को सम्मान और अवसर मिले।” उत्तराखंड की स्थापना 9 नवंबर 2000 को हुई थी, और तब इसे संघर्षों के बीच मिले ‘न्यायपूर्ण और संवेदनशील राज्य’ के रूप में देखा गया था।
लेकिन रजत जयंती वर्ष में यह तस्वीर उन सवालों को फिर से जीवित करती है कि क्या विकास का लाभ वास्तव में हर नागरिक तक पहुंच पाया है? क्या राज्य की नीतियां उस व्यक्ति तक पहुंच सकीं जो आज भी फुटपाथ पर अपनी रातें काटने को विवश है? इस मार्मिक तस्वीर ने यह साबित कर दिया है कि सच्चा उत्सव केवल भाषणों या पोस्टरों में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जो आम जन के जीवन को छू सके। और जब तक राज्य का कोई नागरिक भूखा, बेघर या बेरोजगार रहेगा — तब तक ‘रजत जयंती’ का जश्न अधूरा ही रहेगा।







1 thought on “राज्य स्थापना दिवस : पोस्टर की चकाचौंध में गुम हकीकत की तस्वीर”