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प्रभु यीशु मसीह केवल ईसाई धर्म के संस्थापक नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और क्षमा की ऐसी वैश्विक चेतना हैं, जिन्होंने मानवता को आत्मिक नवीनीकरण का मार्ग दिखाया। उनके जीवन, शिक्षाओं और बलिदान का संदेश आज भी विभाजन और हिंसा से ग्रस्त संसार के लिए आशा और प्रकाश का स्रोत है।
- प्रेम, करुणा और क्षमा के प्रतीक यीशु मसीह
- बेथलहम से विश्व तक मसीह की चेतना
- यीशु की शिक्षाएँ और भारतीय दर्शन का संवाद
- क्रूस से पुनरुत्थान तक मानवता का संदेश
सत्येन्द्र कुमार पाठक
आज से लगभग 2,025 वर्ष पूर्व, इज़राइल की पवित्र भूमि पर एक ऐसी ज्योति का प्रकटीकरण हुआ, जिसने दुनिया के इतिहास, भूगोल और अध्यात्म को हमेशा के लिए बदल दिया। यीशु मसीह, जिन्हें ईसा मसीह भी कहा जाता है, न केवल ईसाई धर्म के संस्थापक हैं, बल्कि वे प्रेम, क्षमा और करुणा के वैश्विक प्रतीक हैं। आज दुनिया का सबसे बड़ा धर्म उन्हीं की शिक्षाओं पर आधारित है, लेकिन उनका व्यक्तित्व किसी एक धर्म की सीमाओं में नहीं बँधा है। वे एक महान शिक्षक, भविष्यद्वक्ता, चमत्कारी उपचारक और करोड़ों लोगों के लिए ‘परमेश्वर के पुत्र’ हैं।
यीशु का जन्म यहूदिया प्रांत के बेथलहम नगर में हुआ था। बाइबिल के अनुसार उनकी माता मरियम एक कुंवारी थीं, जिन्हें पवित्र आत्मा के माध्यम से गर्भधारण हुआ था। उनके सांसारिक पिता यूसुफ, जो राजा दाऊद के वंशज और एक कुशल बढ़ई थे, ने इस दिव्य बालक का संरक्षण किया। जिस समय यीशु का जन्म हुआ, उस समय इज़राइल पर रोमन साम्राज्य का शासन था और स्थानीय राजा हेरोदेस अत्यंत क्रूर था। यीशु का जन्म किसी आलीशान महल में नहीं, बल्कि एक साधारण खलिहान (मंजर) में हुआ। यह घटना सिखाती है कि ईश्वर विनम्रता और सादगी में वास करता है। उनके जन्म की स्मृति में हर वर्ष 25 दिसंबर को ‘क्रिसमस’ मनाया जाता है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव है।
ईसाई धर्म का केंद्रीय सिद्धांत यह है कि यीशु पूर्णतः ईश्वर (गॉड) और पूर्णतः मनुष्य (मैन) दोनों थे। उन्हें “वचन” (द वर्ड) कहा गया है। बाइबिल के यूहन्ना के सुसमाचार में लिखा है, “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था… और वचन देहधारी हुआ।” वे एक इंसान की तरह भूख, प्यास और पीड़ा महसूस करते थे, लेकिन उनकी आत्मा दिव्य थी। उनका उद्देश्य मानवता को उसके पापों से मुक्त करना और ईश्वर के साथ उसका पुनर्मिलन कराना था। इसी कारण उन्हें ‘मसीहा’ या ‘क्राइस्ट’ कहा गया, जिसका अर्थ है—‘अभिषिक्त’ या ‘उद्धारकर्ता’।
यीशु के ‘अज्ञात वर्ष’ और भारत से गहरा लगाव – यीशु के जीवन के बारे में बाइबिल में 12 वर्ष की आयु के बाद सीधे 30 वर्ष की आयु का वर्णन मिलता है। इन बीच के 18 वर्षों को “अज्ञात वर्ष” (लॉस्ट इयर्स) कहा जाता है। कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं, जैसे निकोलस नोतोविच और स्वामी अभेदानंद, का मानना है कि इस अवधि में यीशु ने भारत की यात्रा की थी। माना जाता है कि उन्होंने जगन्नाथ पुरी, राजगीर और काशी में रहकर वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया। उनके उपदेशों में दिखाई देने वाली अद्वैत भावना, जैसे “मैं और पिता एक हैं”, को भारतीय दर्शन का प्रभाव माना जाता है। लद्दाख के हेमिस मठ में मिले प्राचीन अभिलेखों के अनुसार ‘संत ईसा’ ने हिमालयी मठों में रहकर पाली भाषा सीखी और बुद्ध की करुणा के मार्ग को अपनाया। श्रीनगर के रोज़ाबल से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद यीशु जीवित बचे और अंततः कश्मीर आकर उन्होंने अपना शेष जीवन बिताया।
यीशु की शिक्षाएँ प्राचीन भारतीय दर्शन से अत्यंत साम्य रखती हैं। बुद्ध की करुणा और यीशु का प्रेम एक ही चेतना की अभिव्यक्ति प्रतीत होते हैं। दोनों ने बाहरी कर्मकांडों की बजाय आंतरिक शुद्धि पर बल दिया। जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत को यीशु ने “अपने शत्रु को भी क्षमा करो” के रूप में प्रतिपादित किया। सनातन धर्म के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना की तरह यीशु ने भी संपूर्ण मानवता को एक ही ईश्वर की संतान बताया। यीशु द्वारा किए गए चमत्कार केवल अलौकिक घटनाएँ नहीं, बल्कि उन्हें एक सिद्ध योगी की शक्तियों के रूप में भी देखा जाता है। पानी पर चलना ‘लघिमा सिद्धि’ का प्रतीक माना जाता है, मृतकों को जिलाना प्राण विद्या की उच्च अवस्था का संकेत है और पाँच हज़ार लोगों को भोजन कराना पदार्थ रूपांतरण की क्षमता का उदाहरण। यीशु ने इन शक्तियों का उपयोग कभी प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता के कल्याण के लिए किया।
यीशु ने अपने पीछे 12 मुख्य अनुयायी छोड़े, जिन्हें प्रेरित कहा जाता है। उन्होंने यीशु के संदेश को संसार के कोने-कोने तक पहुँचाया। उनके उपदेशों का मूल भाव क्षमा, विनम्रता और सेवा था—“यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा भी उसकी ओर कर दो”, “धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” और “मनुष्य का पुत्र सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने आया है।” क्रिसमस के समय सजा हुआ सदाबहार पेड़ अनंत जीवन का प्रतीक है। जिस प्रकार कड़ाके की ठंड में भी यह पेड़ हरा रहता है, उसी प्रकार यीशु का प्रेम हर परिस्थिति में जीवंत रहता है। उसके शीर्ष पर लगा सितारा बेथलहम के तारे की स्मृति कराता है और जगमगाती रोशनियाँ यीशु को “जगत की ज्योति” के रूप में दर्शाती हैं।
यीशु के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण उनका क्रूसीकरण था। उन्होंने मानवता के पापों का भार अपने ऊपर लिया और क्रूस पर अपने प्राण त्याग दिए। किंतु उनकी कथा यहीं समाप्त नहीं होती। तीन दिन बाद उनका पुनरुत्थान हुआ, जो इस सत्य को प्रमाणित करता है कि प्रेम और सत्य मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली हैं। यीशु मसीह को केवल एक धर्म के संस्थापक के रूप में देखना उन्हें सीमित करना होगा। वे एक ऐसी ‘मसीही चेतना’ हैं, जो हर उस व्यक्ति के भीतर जागृत हो सकती है, जो प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलता है। चाहे वे इज़राइल में उपदेश दे रहे हों या हिमालय की कंदराओं में साधना कर रहे हों, उनका संदेश एक ही था—“ईश्वर प्रेम है।” आज के अशांत युग में, जब नफरत और विभाजन की दीवारें ऊँची हो रही हैं, यीशु मसीह की शिक्षाएँ—“अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो”—मानवता के लिए जीवनदायी फुहार के समान हैं।
लेखक का विवरण:
सत्येन्द्र कुमार पाठक, करपी, अरवल, बिहार – 804419, मोबाइल: 9472987491








