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कुछ पा जाई निम्मन चिज्जी, त बचा–चोरा के रखले रहि। “तेहुँ खइली?” जब पूछेली, त झट से कहेले—“खइले रहिं।” हमार पसंद के हर चिज्जी बिना खियइले मानत नइखे। माई बस दुनियाँ में एक्के ह, जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे॥
सिद्धार्थ गोरखपुरी, गोरखपुर, उ. प्र.
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माई बस दुनियाँ में एक्के ह,
जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे।
एक्को क्षेत्र बचल नाहीं बा,
जेहमें माई के महारथ नइखे॥
प्यार–मार के साझा संग्रह,
माई लिखेले… माई छापेले।
लड़िकवा अब कतना सयान भइले,
अंगुरी–बित्ता से नापेले।
कवनो दिन न बचे जीवन में
माई जहिआ पुचकारत नइखे।
माई बस दुनियाँ में एक्के ह,
जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे॥
कुछ पा जाई निम्मन चिज्जी,
त बचा–चोरा के रखले रहि।
“तेहुँ खइली?” जब पूछेली,
त झट से कहेले—“खइले रहिं।”
हमार पसंद के हर चिज्जी
बिना खियइले मानत नइखे।
माई बस दुनियाँ में एक्के ह,
जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे॥
अचरा से पोछत मुँह रहे,
ओही अचरा के छाँव में रखले रहे।
बड़ भइलीं त पता चलल—
उ कवने जतन से पलले रहे।
ओकरा त्याग के एवज में
घुन्नी भर ओकरा हिफाज़त नइखे।
माई बस दुनियाँ में एक्के ह,
जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे॥
जबले जीवन में साँस रही,
माई के सेवा में लागल रहब।
उ सुति जाई त सुति जाइब,
नाहीं त हमहूँ जागल रहब।
ई सब त हमार धरम अहे,
जेहमें गलती के स्वागत नइखे।
माई बस दुनियाँ में एक्के ह,
जेकरा मन में कुछ स्वारथ नइखे॥








