
यह पत्र साहित्य जगत में बढ़ती नकल, कॉपी-पेस्ट प्रवृत्ति और वास्तविक साहित्यकारों की उपेक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है। लेखक ने सरकार और प्रकाशकों से श्रेष्ठ साहित्य सृजन करने वाले रचनाकारों को पेंशन, आवास, यात्रा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ देने की माँग की है।
- साहित्य जगत में बढ़ती नकल की समस्या
- सृजनशील साहित्यकारों के समक्ष संकट
- मानदेय और सम्मान का अभाव
- साहित्यकारों के लिए सरकारी संरक्षण की माँग
सुनील कुमार माथुर
श्रेष्ठ साहित्य सृजन वर्तमान समय की आवश्यकता है, लेकिन आज अधिकांश आलेख, कविताएँ नवांकुर साहित्यकार इधर-उधर से उठाकर अपने नाम से प्रकाशित करवा रहे हैं। कहीं कॉपी-पेस्ट चल रहा है। नतीजतन, नियमित रूप से वर्षों से साहित्य सृजन करने वालों के समक्ष एक गंभीर संकट पैदा हो गया है। चूँकि आज पत्र-पत्रिकाएँ ऑनलाइन हो जाने से हार्ड कॉपी के अभाव में शिकायत दर्ज नहीं कराई जा सकती।
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दूसरी ओर, आज साहित्यकारों को सम्पादक मंडल की ओर से न तो किसी प्रकार का मानदेय दिया जाता है और न ही प्रकाशित रचना की निःशुल्क लेखकीय प्रति। इतना ही नहीं, सम्पादक मंडल द्वारा कभी साहित्यकार को प्रोत्साहन स्वरूप प्रशस्ति-पत्र भी नहीं दिया जाता, जिसके कारण वे विभिन्न संस्थाओं से सम्मानित भी नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन, फर्जी वरिष्ठ साहित्यकारों की फौज बढ़ती जा रही है और वे आए दिन किसी न किसी संस्था से सम्मानित हो रहे हैं।
अतः प्रकाशकों तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार को चाहिए कि वे स्वतंत्र रूप से श्रेष्ठ साहित्य सृजन करने वाले रचनाकारों को हर माह कम से कम 20,000 रुपये मासिक पेंशन दें। उन्हें रियायती दर पर बने-बनाए उच्च गुणवत्ता के मकान उपलब्ध कराएँ। सभी श्रेणी की सरकारी बसों तथा सभी श्रेणी की ट्रेनों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा दें। उनके परिजनों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ तथा नियमित रूप से साहित्य सृजन हेतु निःशुल्क लैपटॉप वितरित करें, ताकि वे निर्बाध रूप से श्रेष्ठ साहित्य सृजन कर सकें और आर्थिक भार से भी मुक्ति पा सकें।
साहित्यकारों को साहित्य सृजन हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रायः आना-जाना पड़ता है, इसलिए बसों और ट्रेनों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साहित्यकारों को समय-समय पर साहित्य सम्मेलनों में भी जाना पड़ता है। अतः सरकार को उन्हें पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, 33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान






