
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार
शहर की सबसे महंगी पाठशाला में पढ़ने वाला आर्यन हमेशा अव्वल आता था। उसके पास हर विषय की सबसे नई किताबें थीं, और उसके अंक पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा थे। वह मानता था कि शिक्षा का मतलब है ढेर सारे अंक और अच्छी नौकरी। एक दिन दिवाली की छुट्टियों में, आर्यन अपने दादाजी के गाँव गया। वहाँ, वह एक गरीब लेकिन हंसमुख लड़के, रवि से मिला। रवि सरकारी स्कूल में पढ़ता था और उसके पास पुरानी, फटी किताबें थीं।
आर्यन ने घमंड से पूछा, “तुम इतनी पुरानी किताबें क्यों पढ़ते हो? अच्छी किताबें खरीदो, तभी अच्छे नंबर आएंगे।” रवि मुस्कुराया। उसने आर्यन को पास के बगीचे में ले जाकर दिखाया कि कैसे वह पक्षियों के लिए पानी रखता है, कैसे गाय को चारा देता है, और कैसे अपने बूढ़े पड़ोसी को रोज बाजार से सामान लाकर देता है। “मेरे दादाजी कहते हैं,” रवि ने कहा, “कि ज्ञान सिर्फ दिमाग में नहीं, दिल में भी होना चाहिए।
Government Advertisement...
अगर हमारी पढ़ाई हमें दया करना नहीं सिखाती, तो वह बेकार है।” शाम को, जब आर्यन ने रवि को अपनी पुरानी दीवाली की कहानी की किताब एक छोटे, गरीब बच्चे को देते देखा, तो उसकी आँखें खुल गईं। रवि के चेहरे पर जो शांति और खुशी थी, वह आर्यन के कभी न पूरे होने वाले अंकों की दौड़ में नहीं थी। आर्यन को समझ आया कि उसके दादाजी ने सही कहा था: सच्ची शिक्षा वह है जो दूसरों के जीवन में भी दीये जलाए। उस दिन से, आर्यन ने केवल दिमाग से नहीं, बल्कि दिल से भी पढ़ना शुरू कर दिया।








