
यह कविता शिव के स्वर के माध्यम से त्याग, समता, करुणा और संतुलन का संदेश देती है। धर्म-जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर सत्य और प्रेम को अपनाने का आह्वान किया गया है। रचना मानव जीवन को शिव पथ पर चलकर उजियारा और संतोष प्राप्त करने की प्रेरणा देती है।
- कैलाश से गूंजता मानवता का आह्वान
- नीलकंठ का त्याग और जीवन का उजियारा
- शिव पथ पर शुद्ध मन और प्रेम की साधना
- संतुलन, सत्य और प्रकृति संग जीवन
डॉ. प्रियंका सौरभ
कैलाश से जब स्वर गूंजे,
मनुष्य का मन आनंदित हो जाए।
नीलकंठ बन दुख सह ले,
सबका जीवन दीपित हो जाए।
त्याग और समता की छाया,
सबके हृदय में उजियारा हो जाए।
मोह-माया से मन को छुड़ाएँ,
संतोष में हर दुख भुला जाए।
धर्म-जाति की दीवारें गिरें,
सत्य और करुणा सबमें बस जाए।
प्रकृति संग जीवन मुस्काए,
संतुलन से सृष्टि खिल जाए।
शिव के पथ पर कदम बढ़ाएँ,
मन और हृदय पूर्णतः शुद्ध हो जाए।
भक्ति और प्रेम से जीवन महकाएँ,
सारा जग इसी उजाले में नहाए।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)










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