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यह आलेख शब्दों की शक्ति, उनके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव तथा मानवीय संबंधों में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है। लेखक सोच की शुद्धता, संयमित संवाद और अच्छे शब्दों के अभ्यास को जीवन की सार्थकता से जोड़ता है।
- शब्दों की शक्ति और मानवीय संबंध
- सकारात्मक सोच और समृद्ध शब्दकोश
- मधुर वाणी से बनता जीवन
- शब्द, संवाद और जीवन की सार्थकता
सुनील कुमार माथुर
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शब्दों की दुनिया भी बड़ी निराली है। अगर शब्द महक जाएँ तो दुनिया को अपना बना लेते हैं और सभी को अपना बना लेते हैं, लेकिन शब्द बहक जाएँ तो लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाने के बजाय घाव कर देते हैं। इसलिए जब भी किसी से संवाद करें तो सोच-समझकर सही शब्दों का इस्तेमाल कर सामने वाले के दिल में अपना स्थान बना लीजिए। अगर आपकी सोच सकारात्मक है तो आपके मन-मस्तिष्क में शब्दों की डिक्शनरी यानी शब्दकोश काफी अच्छा होगा, और आपकी सोच नकारात्मक है तो आपके मन-मस्तिष्क का शब्दकोश भी कूड़ेदान के समान होगा, जहाँ गंदे शब्दों की भरमार होगी।
अतः हमेशा अपनी सोच सकारात्मक रखें और हर रोज नए शब्दों को अंगीकार कर अपने शब्दकोश को अपडेट करते रहिए। शब्दों में बड़ी ताकत होती है। वे जहाँ मधुर संबंध बनाते हैं, वहीं कड़वे बोल आपके संबंधों को एक झटके में बिखेर देते हैं। इसलिए शब्दों की अहमियत को समझें और जब जरूरत हो तभी बोलें। बेकार की बकवास कर अपना समय बर्बाद न करें। अच्छा बोलें, अच्छा सुनें, अच्छा पढ़ें और अच्छा लिखें। तभी जीवन की सार्थकता है।
लेखक विवरण:
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, जोधपुर, राजस्थान








