
यह आलेख भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के पत्रकार रूप को रेखांकित करता है, जिन्होंने राजनीति में आने से पूर्व अपनी लेखनी से राष्ट्रचेतना को दिशा दी। ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने निर्भीक, मूल्यनिष्ठ और राष्ट्रप्रथम पत्रकारिता की मिसाल स्थापित की।
- पत्रकारिता से राष्ट्रनीति तक अटल जी की यात्रा
- ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ के प्रणेता
- आपातकाल में कलम का अदम्य साहस
- संपादन में सिद्धांत, संघर्ष और राष्ट्रवाद
सत्येंद्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार
भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व उस हिमालय की तरह था, जिसकी ऊँचाई तो सब देखते हैं, लेकिन उसकी दृढ़ता उन चट्टानों में छिपी होती है जो नींव का काम करती हैं। अटल जी के लिए वह नींव ‘पत्रकारिता’ थी। राजनीति के मैदान में उतरने से बहुत पहले, अटल जी ने अपनी कलम से देश की वैचारिक दिशा तय की थी। वे एक ऐसे संपादक थे, जिन्होंने शब्दों को केवल कागज़ पर उकेरा नहीं, बल्कि उन्हें राष्ट्र-जागरण का मंत्र बना दिया। उनका पत्रकारिता जीवन सिद्धांतों, संघर्षों और अटूट राष्ट्रवाद की एक ऐसी गाथा है, जो आज की पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शिका है।
पत्रकारिता के संस्कार और संघर्ष का प्रारंभ
अटल जी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ साहित्य और भाषा का सम्मान था। उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी स्वयं एक कवि थे। यहीं से अटल जी को शब्दों की मर्यादा और उनकी शक्ति का बोध हुआ। 1940 के दशक में, जब भारत अपनी आज़ादी की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था, युवा अटल ने महसूस किया कि समाज को जोड़ने और जगाने के लिए पत्रकारिता से सशक्त कोई माध्यम नहीं है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक मिशनरी पत्रकार के रूप में की, जहाँ ‘स्व’ से पहले ‘सर्वस्व’ (राष्ट्र) की भावना सर्वोपरि थी।
‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’: एक वैचारिक क्रांति
अटल जी की पत्रकारिता का स्वर्ण काल लखनऊ में व्यतीत हुआ। यहाँ उन्होंने दो ऐसी पत्रिकाओं को जन्म दिया, जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को बदलकर रख दिया।
राष्ट्रधर्म (मासिक): 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब वैचारिक स्पष्टता की बड़ी आवश्यकता थी। ‘राष्ट्रधर्म’ के माध्यम से अटल जी ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद का ऐसा स्वर गुंजाया कि वह प्रबुद्ध वर्ग की पहली पसंद बन गई।
पांचजन्य (साप्ताहिक): 14 जनवरी 1948 को ‘पांचजन्य’ का उदय हुआ। अटल जी इसके संस्थापक संपादक थे। उनके तीखे और स्पष्ट संपादकीय का प्रभाव ऐसा था कि दूसरे अंक की 8 हजार और तीसरे की 12 हजार प्रतियाँ छापनी पड़ीं। यह उस समय की एक क्रांतिकारी घटना थी।
उनके पहले संपादकीय की गूँज:
“पांचजन्य का जन्म किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उस सत्य की रक्षा के लिए हुआ है जो सदियों से उपेक्षित रहा है। यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना की वाणी है।”
संपादक की बहुमुखी भूमिका: जब अटल जी खुद बने ‘हॉकर’
एक कुशल संपादक केवल एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर निर्देश नहीं देता। अटल जी ने पत्रकारिता के हर छोटे-बड़े काम को गौरव के साथ किया। लखनऊ के कार्यालय में वे स्वयं कंपोजिटर और प्रूफरीडर की भूमिका निभाते थे। संसाधनों के अभाव में उन्होंने खुद साइकिल पर समाचार पत्र के बंडल लादकर गलियों में वितरित किए। यह उनकी लगन ही थी कि ‘पांचजन्य’ और ‘राष्ट्रधर्म’ आज भी जीवित स्तंभों के रूप में खड़े हैं।
‘स्वदेश’ और ‘वीर अर्जुन’: निर्भीकता का पर्याय
दैनिक समाचार पत्रों ‘स्वदेश’ और ‘वीर अर्जुन’ का संपादन करते समय अटल जी ने पत्रकारिता को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ वास्तविक अर्थों में बनाया। वे सत्ता के सामने सच बोलने से कभी नहीं हिचकिचाए। उनकी भाषाई मर्यादा ऐसी थी कि वे बिना किसी अपशब्द के भी व्यवस्था की खामियों पर करारी चोट करते थे। उनका मानना था कि पत्रकार का धर्म तटस्थ रहना नहीं, बल्कि सत्य का पक्ष लेना है।
आपातकाल और जेल से ‘कलम’ की लड़ाई
1975 का आपातकाल अटल जी के ‘संपादक मन’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। जब प्रेस की आज़ादी छीन ली गई, तब उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे से अपनी लेखनी को हथियार बनाया। उनकी ‘कैदी कविराय की कुंडलियां’ गुप्त रूप से जेल से बाहर आती थीं और भूमिगत अखबारों में छपकर जनता का साहस बढ़ाती थीं। उन्होंने सिद्ध किया कि शरीर को कैद किया जा सकता है, लेकिन विचारों को नहीं।
कविता और पत्रकारिता का अद्भुत संगम
अटल जी की कविताएँ उनकी पत्रकारिता का विस्तार थीं। जहाँ संपादकीय में वे तर्क देते थे, वहीं कविताओं में वे भावनाएँ पिरोते थे। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ उनके संघर्षपूर्ण पत्रकारीय जीवन का आईना हैं:
“बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएँ…
निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।”
अटल जी की पत्रकारिता के 11 विशेष पहलू
- राष्ट्र प्रथम: हर शब्द में देशहित का भाव।
- सांस्कृतिक गौरव: भारतीय मूल्यों का संरक्षण।
- निर्भीकता: दमनकारी नीतियों का डटकर विरोध।
- सरल भाषा: क्लिष्ट शब्दों के बजाय जनभाषा को प्राथमिकता।
- साहित्यिक पुट: लेखों में काव्य जैसा प्रवाह।
- नैतिक मूल्य: पेड-न्यूज और पीत-पत्रकारिता से कोसों दूर।
- परिश्रम: संपादन से लेकर वितरण तक सक्रियता।
- दूरदर्शिता: भविष्य की चुनौतियों को पहले भाँप लेना।
- स्पष्टवादिता: घुमाव-फिराव के बिना सीधी बात।
- विपक्ष का सम्मान: वैचारिक मतभेद के बावजूद गरिमा बनाए रखना।
- निस्वार्थ सेवा: पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, ‘मिशन’ माना।
एक शाश्वत प्रेरणा स्रोत
अटल बिहारी वाजपेयी जी का संपादन काल केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं था, बल्कि वह ‘अग्नि-दीक्षा’ थी। उन्होंने पत्रकारिता को वह गरिमा प्रदान की, जिसकी आज सख्त आवश्यकता है। वे अक्सर कहते थे कि वे “गलती से राजनीति में आ गए,” क्योंकि उनका हृदय तो एक पत्रकार का था, जो हमेशा समाज के सच को शब्द देना चाहता था।
आज जब हम अटल जी को याद करते हैं, तो हमें एक ऐसा संपादक दिखाई देता है, जिसने अपनी लेखनी से भारत के भाग्य का संपादन किया। उनकी विरासत ‘पांचजन्य’ की गूँज और ‘राष्ट्रधर्म’ की चेतना में सदैव जीवित रहेगी।
“हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ।”








