
सुनील कुमार माथुर
हे लक्ष्मी मां! मैं कैसे दीप जलाऊं!! महंगाई, गुंडागर्दी, महिलाओं व बच्चियों से छेड़छाड़, मिलावटखोरों का गोरखधंधा, बढ़ते अपराध, मिठाई के साथ तुलते डिब्बे — हे मां! अब आप ही बताइए, मैं कैसे दीप जलाऊं? हर ओर लुटेरों का साम्राज्य है। पूरे पैसे देने पर भी असली खाद्य सामग्री कहां है? घी, पनीर, मावा—सभी में तो मिलावट भरी पड़ी है। खाने के नाम पर हम हर रोज धीमा जहर ले रहे हैं। यहां तक कि सब्जियों में भी स्वाद नहीं रहा।
यह कैसी चालाकी! पहले जमकर जनता-जनार्दन को लूटा गया, और अब जीएसटी कम करने के नाम पर एक अनोखा और अनूठा खेल खेला जा रहा है। जनता तो अब भी लुट ही रही है। जिस हिसाब से बाजार में किराने का सामान और सब्जियां बिक रही हैं, वह तो लूट का जरिया है। हकीकत में तो दाम बहुत ही कम हैं। यही हाल मकानों का है। मकानों और जमीनों के भावों ने जनता-जनार्दन के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। चूंकि सरकार ने व्यापारियों को खुली छूट दे रखी है — खाओ और खिलाओ! तभी तो भ्रष्टाचारियों के मजे ही मजे हैं। जनता-जनार्दन सदा से लुटती आई है और लुटती रहेगी, क्योंकि इसका कोई धनी-धोरी नहीं है।
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हे लक्ष्मी मां! जनता की क्रय शक्ति खत्म हो गई है। त्योहार के नाम पर लोग चेहरे पर झूठी मुस्कान लिए घूम रहे हैं। भीतर से दिल रो रहा है और बाहर हंसने-हंसाने का नाटक कर रहे हैं। हे मां! ऐसी दीपावली किसी को नसीब न हो, जहां छल-कपट, बेईमानी, हेराफेरी, ठगी, हिंसा और गुंडागर्दी का नंगा नाच और तांडव मचा हो। हे लक्ष्मी मां! कल तो एक अनोखा नजारा देखने को मिला। मैं अस्पताल गया था। वहां एक सेठानी उपचार कराने के लिए आई। वह ऊपर से नीचे तक सोने से लदी हुई थी। एक बार तो उसे देखकर लगा कि लक्ष्मी जी स्वयं इलाज के लिए आई हों — शायद त्योहार पर कोई मिलावटी मिठाई खा ली हो! वह बार-बार बेहोशी की स्थिति में जा रही थी।
डॉ. आरुषि ने उस सेठानी के पति से पूछा, “इन्हें क्या बीमारी है?” पतिदेव बोले, “डॉ. साहब, इन्हें कोई बीमारी नहीं है। आज धनतेरस पर मैंने इन्हें नए जेवरात नहीं दिलाए, इसलिए ये बार-बार मूर्छित हो रही हैं।” यह सुनकर डॉ. आरुषि ने मुस्कराते हुए कहा, “इसका उपचार ज्वेलरी शोरूम में ही होगा, और एक डोज कम से कम दस लाख रुपए की होगी — अन्यथा रात निकालना भारी पड़ जाएगा।” हे लक्ष्मी मां! सेठानी जी तो भाग्यशाली हैं जिन पर आपकी कृपा बनी हुई है, और जो आपसे प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। अन्यथा सोने के भाव सुनकर ही आम आदमी को चक्कर आने लगते हैं।
मां! मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि देश में चारों ओर अमन-चैन कायम रहे। जनता-जनार्दन को दो वक्त की रोटी बिना बेईमानी और भ्रष्टाचार के मिलती रहे, सभी का स्वास्थ्य ठीक रहे, और कोई भी व्यक्ति बीमार न पड़े। हे लक्ष्मी मां! इस साहित्यकार की बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जो है, वही मैंने कह दिया है। यह एक कटु सत्य है, जो आप भलीभांति जानती हैं। सभी देशवासियों पर सदैव अपनी कृपा बनाकर रखिए, और जब भी किसी को कोई परेशानी आए, तो आधी रात को भी उसकी रक्षा कीजिए।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान









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