
यह कविता बीतते वर्ष 2025 के आत्ममंथन, सीख और अनुभवों को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि अपने संघर्ष, आशा, आत्मचिंतन और सामाजिक सद्भाव के संदेश के साथ नए वर्ष को जिम्मेदारी और सकारात्मक सोच से अपनाने की प्रेरणा देता है। कविता जीवन में संवाद, क्षमा, उल्लास और रचनात्मकता के महत्व को रेखांकित करती है।
- बीतते वर्ष का आत्मचिंतन
- नया साल, नई सोच
- समय की सीख और अनुभव
- जीवन, संवाद और जिम्मेदारी
गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान
देखते ही देखते साल 2025 भी यह निकल गया,
क्या हिसाब-किताब रखना, अब क्या आया-गया।
देखेंगे, सोचेंगे, क्या खरीदेंगे नूतन वर्ष में नया-नया,
गलतियाँ कैसी हुईं हमसे, यह एहसास करा गया॥
लिख रहा हूँ अंतिम रचना इस वर्ष की डरते-डरते,
पलट नहीं पा रहा हूँ पन्ना, वेदना यह सहते-सहते।
बहुत सीखा इन बारह महीनों में, बचा मरते-मरते,
जीना हर्ष व उल्लास से, रहा सबको कहते-कहते॥
भले न थी हाथों में मेरे सुलझाऊँ किसी की गुत्थी,
उम्मीद लिए रचता रहा रचनाएँ, ले कागज़-तख्ती।
बनी सहायक तब माँ शारदे, किया मैंने सच्ची भक्ति,
त्याग-तपस्या, क्षमा-भाव एवं दर्शाई मौज-मस्ती॥
मतभेद न रखो अब आपस के, कर लो वाद-संवाद,
बोली से हुई गलतफ़हमी को मत बनाओ विवाद।
कम हो गया एक साल सबके जीवन का ये आज,
फड़फड़ा रहा कैलेंडर का पन्ना, क्या हुई परिवाद॥
इस आने वाले नए साल को सब बना दो यादगार,
अगर अच्छी लगें मेरी बातें तो करना सब विचार।
न रहती ये बादशाहतें कायम, बनो सब ज़िम्मेदार,
कवि उदय की रचनाओं का सब करते रहें प्रचार॥









