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दिसंबर 2025 की रिपोर्टों के अनुसार भारतीय रुपया एशिया की टॉप टेन मजबूत मुद्राओं की सूची से बाहर हो गया है और इस साल की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्राओं में शामिल हो गया है। विदेशी निवेश की निकासी और व्यापारिक अनिश्चितताओं ने सरकार के आर्थिक दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- डॉलर के सामने बेबस रुपया, आर्थिक दावों पर खड़े हुए सवाल
- एफआईआई की निकासी और व्यापारिक अनिश्चितता ने बढ़ाई रुपये की कमजोरी
- ‘विश्वगुरु’ के दौर में एशिया की कमजोर मुद्राओं में शामिल भारत
- आम आदमी की थाली से सरकार के नारों तक, गिरते रुपये का असर
राज शेखर भट्ट
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दिसंबर 2025 के अंत में सामने आई आर्थिक रिपोर्टों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चमकदार तस्वीर पर गहरी खरोंच लगा दी है। जिस रुपये को कभी “स्थिर और भरोसेमंद मुद्रा” बताकर सरकार अपनी पीठ थपथपाती रही, वही रुपया अब एशिया की टॉप टेन मजबूत मुद्राओं की सूची से बाहर हो चुका है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 4.3 प्रतिशत की गिरावट के साथ भारतीय रुपया 2025 में एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिना जा रहा है। सरकारी मंचों से बार-बार यह दावा किया जाता रहा है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
लेकिन सवाल यह है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है, तो उसकी मुद्रा क्यों लगातार कमजोर हो रही है? एशिया और खाड़ी क्षेत्र की कई मुद्राएं—जैसे कुवैती दिनार, सिंगापुर डॉलर—जहां मजबूती दिखा रही हैं, वहीं भारतीय रुपया न केवल उनसे पीछे छूट गया है, बल्कि कुछ विश्लेषणों में तो अफगानिस्तान की अफगानी मुद्रा से भी कमजोर आंका गया है। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का लगातार पैसा निकालना माना जा रहा है। 2025 के दौरान एफआईआई ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजारों से बड़े पैमाने पर पूंजी निकाली। इसका सीधा असर रुपये की मांग पर पड़ा और डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत लगातार गिरती चली गई।
सरकार भले ही इसे वैश्विक कारणों का नतीजा बताए, लेकिन निवेशकों का भरोसा डगमगाना किसी भी देश की आर्थिक नीति पर ही सवाल खड़ा करता है। दूसरी ओर, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी और वैश्विक व्यापार युद्ध जैसी स्थितियों ने भी अनिश्चितता का माहौल बनाया। आयात महंगा होता गया, निर्यात अपेक्षित रफ्तार नहीं पकड़ सका और नतीजा यह हुआ कि चालू खाते का दबाव रुपये पर और बढ़ गया। वैश्विक मैक्रो-आर्थिक परिस्थितियां जरूर कठिन हैं, लेकिन हर बार अंतरराष्ट्रीय हालात का बहाना बनाकर घरेलू नीतिगत चूक से आंखें मूंद लेना भी एक तरह की राजनीतिक सुविधा बन चुकी है।
रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस, खाद्य तेल, दवाइयां और इलेक्ट्रॉनिक सामान—सब कुछ महंगा होता जा रहा है। सरकार इसे “वैश्विक महंगाई” कहकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन हकीकत यह है कि कमजोर मुद्रा का बोझ सीधा आम आदमी की जेब पर पड़ता है। जिस विकास की कहानी में सब ठीक-ठाक बताया जा रहा था, उसी कहानी का यह कड़वा अध्याय अब लोगों के सामने है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस नहीं आता और व्यापारिक मोर्चे पर ठोस समझौते नहीं होते, तब तक रुपये के जल्दी मजबूत होने की उम्मीद कम है।
अनुमान है कि आने वाले समय में भी रुपया 90–91 के स्तर के आसपास ही बना रह सकता है। यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसे चेतावनी की तरह लिया जाएगा या फिर इसे भी “उपलब्धि” बताकर प्रचार में बदल दिया जाएगा? जनता के लिए संदेश साफ है—गिरता रुपया सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डालने वाली सच्चाई है। और सरकार के लिए यह एक तंज भरा आईना है, जिसमें विकास, विश्वगुरु और आर्थिक मजबूती के दावों के पीछे छिपी कमजोरियां साफ दिखाई दे रही हैं।








