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रविवार, सूर्य और गायत्री मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक गहरी त्रिवेणी हैं, जो जीवन, चेतना और ज्ञान का प्रतीक है। सूर्य उपासना और गायत्री साधना के माध्यम से मानव अपने भीतर निहित प्रकाश को जाग्रत कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है।
- सूर्य उपासना और रविवार का आध्यात्मिक महत्व
- वेदों में सूर्य और गायत्री का दार्शनिक स्वरूप
- गायत्री मंत्र: सूर्य चेतना से आत्मबोध तक
- भारतीय परंपरा में सूर्य, साधना और चेतना का संबंध
सत्येन्द्र कुमार पाठक
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भगवान सूर्य, जीवन का स्रोत और ऊर्जा का प्रतीक, आदिकाल से ही मानव सभ्यता के केंद्र में रहे हैं। उनकी पूजा लगभग हर संस्कृति में किसी न किसी रूप में की जाती रही है। भारतीय संस्कृति में सूर्य को केवल एक आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि एक देवता, प्रबुद्ध ऊर्जा और चेतना का प्रतीक माना गया है। रविवार, जिसे ‘सूर्यवार’ भी कहा जाता है, इसी सूर्य को समर्पित है। ‘रविवार’ शब्द संस्कृत के ‘रवि’ (सूर्य) और ‘वार’ (दिन) से बना है। पश्चिमी कैलेंडर में भी इसे संडे, सन डे या ‘Sunday’ (Sun’s Day) कहा जाता है, जो सूर्य के प्रति वैश्विक सम्मान को दर्शाता है। भारतीय ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा माना गया है। वह आत्मा, पिता, नेतृत्व, शक्ति और जीवन-ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
रविवार को सूर्य की उपासना से इन गुणों की वृद्धि मानी जाती है। प्राचीन काल से ही रविवार को सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देना, उपवास रखना और सूर्य मंत्रों का जाप करना सामान्य प्रथा रही है। माना जाता है कि इससे स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है। मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन सभ्यताओं में भी सूर्य देवताओं के लिए विशेष दिन और अनुष्ठान प्रचलित थे। वेदों में सूर्य को “जगत की आत्मा” कहा गया है—“सूर्यो आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।” ऋग्वेद में सूर्य को आदित्य, सविता, पूषा और मित्र जैसे नामों से संबोधित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक सूर्य के किसी विशेष भौतिक, चेतनात्मक या आध्यात्मिक पहलू का प्रतिनिधित्व करता है।
पुराणों में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिनका रथ सात घोड़े खींचते हैं। सूर्य पुराण सहित अनेक ग्रंथों में उनकी महिमा, वंश और लीलाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। आयुर्वेद और प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में सूर्य के प्रकाश को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। प्रातःकालीन सूर्य स्नान को विटामिन डी और समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया गया है। भारतीय दर्शन में सूर्य को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक माना गया है, जो आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है। गायत्री को ‘वेदमाता’ कहा गया है, क्योंकि इसे सभी वेदों का सार माना जाता है। गायत्री मंत्र ऋग्वेद के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 में स्थित है, जिसके ऋषि विश्वामित्र हैं।
इस मंत्र का केंद्रीय देवता ‘सविता’ है, जो सूर्य का चेतनात्मक स्वरूप है। “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि” में ‘सवितुः’ सूर्य के प्राणदायक रूप और ‘भर्ग’ उसके दिव्य तेज का प्रतीक है। गायत्री मंत्र मूलतः सूर्य के दिव्य प्रकाश को बुद्धि में धारण कर उसे प्रज्ज्वलित करने की प्रार्थना है। प्राचीन काल से ऋषि-मुनि गायत्री मंत्र का जाप करते आए हैं। यह साधना व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है। माना जाता है कि नियमित जाप से बुद्धि तीव्र होती है, मन शांत होता है और चेतना जागृत होती है। गायत्री मंत्र के कंपन और सूर्य के प्रकाश के बीच गहरा संबंध माना गया है, जो ध्यान और जाप के माध्यम से मस्तिष्क की तरंगों को समन्वित करता है और आंतरिक ज्ञान की अनुभूति कराता है।
रविवार, सूर्य और गायत्री—तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। रविवार सूर्य को समर्पित है, सूर्य ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है और गायत्री मंत्र उस चेतना को भीतर उतारने का सशक्त माध्यम है। यह त्रिवेणी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का अभिन्न अंग है, जो हजारों वर्षों से मानव जीवन को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करती आ रही है। यह हमें स्मरण कराती है कि हमारे भीतर भी एक सूर्य विद्यमान है, जिसे गायत्री साधना के माध्यम से जाग्रत किया जा सकता है।
लेखक का पूर्ण विवरण:
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार – 804419 मोबाइल: 9472987491








