
भारत में सड़क हादसों में युवाओं की बढ़ती मौतें गंभीर सामाजिक चिंता का विषय हैं। तेज़ रफ्तार, नशे में ड्राइविंग, मोबाइल का उपयोग और यातायात नियमों की अनदेखी इन दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं। सड़क सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक संस्कार का प्रश्न है। जागरूकता, अनुशासन और सकारात्मक व्यवहार से अनेक जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
- तेज़ रफ्तार और लापरवाही: युवाओं की जान पर संकट
- सड़क सुरक्षा: नियम नहीं, जीवन की आवश्यकता
- नशा, मोबाइल और स्पीड—मौत के तीन बड़े कारण
- सुरक्षित सड़कें, सुरक्षित भविष्य
डॉ. प्रियंका सौरभ
सड़क हादसे केवल दुर्घटनाएँ नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही और गैर-जिम्मेदार सोच का परिणाम हैं। तेज़ रफ्तार, नशे में ड्राइविंग और मोबाइल का इस्तेमाल युवाओं की ज़िंदगी निगल रहा है। नियमों का पालन कोई मजबूरी नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा का आधार है। ज़रूरत है कि हम सड़क सुरक्षा को आदत और संस्कार बनाएं। एक छोटी-सी सावधानी, धैर्य और जिम्मेदारी कई परिवारों को उजड़ने से बचा सकती है। युवाओं का भविष्य सुरक्षित सड़कों से ही संभव है। भारत में सड़क हादसों में युवाओं की लगातार हो रही मौतें आज एक ऐसी सच्चाई बन चुकी हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं है। हर दिन अख़बारों के पन्ने और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि सड़कें कितनी असुरक्षित होती जा रही हैं। इन हादसों में सबसे अधिक प्रभावित युवा वर्ग हो रहा है—वह वर्ग, जिसे देश का भविष्य कहा जाता है। यह स्थिति न केवल दुखद है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी भी है।
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सड़क दुर्घटनाएँ अचानक होने वाली घटनाएँ नहीं होतीं, बल्कि ये अक्सर मानवीय लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम होती हैं। तेज़ रफ्तार से वाहन चलाना, यातायात नियमों की अनदेखी करना, गलत दिशा में वाहन ले जाना, नींद या थकान की अवस्था में ड्राइव करना, शराब या नशे का सेवन करके गाड़ी चलाना और ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल—ये सभी कारण मिलकर सड़क को मौत का रास्ता बना देते हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश हादसे पूरी तरह रोके जा सकते हैं, यदि थोड़ी-सी सावधानी और समझदारी दिखाई जाए। युवा अवस्था जोश, आत्मविश्वास और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति से भरी होती है। यही गुण जब अनुशासन और जिम्मेदारी से जुड़े हों, तो प्रगति का मार्ग बनाते हैं, लेकिन जब यही जोश लापरवाही में बदल जाए, तो विनाश का कारण बनता है। आज कई युवा तेज़ रफ्तार को शान और नियम तोड़ने को साहस समझने लगे हैं। “कुछ नहीं होगा” या “मैं संभाल लूँगा” जैसी सोच उन्हें खतरनाक फैसले लेने के लिए प्रेरित करती है। दुर्भाग्यवश, एक छोटी-सी गलती पूरे जीवन को समाप्त कर देती है।
आधुनिक जीवनशैली और तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। मोबाइल फोन आज जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन ड्राइविंग के दौरान इसका इस्तेमाल जानलेवा साबित हो रहा है। एक पल की असावधानी, एक मैसेज पढ़ने या कॉल उठाने की कोशिश कई जिंदगियों को छीन सकती है। इसके बावजूद लोग इस खतरे को गंभीरता से नहीं लेते। यही उदासीनता सड़क हादसों की बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण है। शराब पीकर वाहन चलाना भी भारत में सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण है। कई लोग इसे अपराध नहीं, बल्कि सामान्य बात समझते हैं। दोस्तों के साथ पार्टी के बाद खुद गाड़ी चलाने का आत्मविश्वास, या यह सोच कि “थोड़ी-सी शराब से क्या फर्क पड़ेगा”, अक्सर घातक सिद्ध होती है। नशे की हालत में प्रतिक्रिया समय कम हो जाता है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है, जिससे दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
इसके अलावा, नींद की झपकी और थकान भी एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला कारण है। लंबी दूरी की यात्रा, रात में ड्राइविंग या लगातार काम के बाद वाहन चलाना शरीर और मस्तिष्क पर भारी पड़ता है। कई हादसे केवल इसलिए हो जाते हैं क्योंकि चालक कुछ सेकंड के लिए झपकी ले लेता है। यह कुछ सेकंड किसी के पूरे जीवन पर भारी पड़ सकते हैं। सरकार और प्रशासन द्वारा सड़क सुरक्षा को लेकर कई प्रयास किए गए हैं। यातायात नियम बनाए गए हैं, जुर्माने बढ़ाए गए हैं, हेलमेट और सीट बेल्ट को अनिवार्य किया गया है और जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब लोग उन्हें दिल से स्वीकार करें। केवल डर के कारण नियमों का पालन करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए सोच और व्यवहार में बदलाव जरूरी है।
सड़क सुरक्षा को केवल प्रशासन की जिम्मेदारी मान लेना एक बड़ी भूल है। यह हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। एक चालक के रूप में हमारी लापरवाही न केवल हमारी जान के लिए खतरा है, बल्कि सड़क पर चल रहे अन्य लोगों के जीवन को भी जोखिम में डालती है। पैदल चलने वाले, साइकिल सवार, बुजुर्ग और बच्चे—सभी हमारी एक गलती का शिकार बन सकते हैं। परिवार और शिक्षा व्यवस्था की भूमिका भी इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति देने से पहले उन्हें यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा का सही ज्ञान दें। केवल वाहन चलाना सिखा देना पर्याप्त नहीं है; सुरक्षित और जिम्मेदार ड्राइविंग की आदत डालना ज़रूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में भी सड़क सुरक्षा को लेकर नियमित जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए, ताकि युवा उम्र से ही इन मूल्यों को अपनाएँ।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। फिल्मों और विज्ञापनों में अक्सर तेज़ रफ्तार और जोखिम भरी ड्राइविंग को रोमांच और बहादुरी के रूप में दिखाया जाता है। इसका प्रभाव युवाओं पर गहरा पड़ता है। ज़रूरत है कि मनोरंजन के माध्यमों में भी जिम्मेदार संदेश दिए जाएँ और सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा दिया जाए। समाज के स्तर पर भी सोच में बदलाव की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि नियम तोड़ना चालाकी नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदारी है। शराब पीकर या बिना हेलमेट के वाहन चलाने वाले को शाबाशी नहीं, बल्कि रोक और समझाइश मिलनी चाहिए। जब तक लापरवाही पर सामाजिक अस्वीकार नहीं होगा, तब तक इस समस्या पर काबू पाना मुश्किल है। आज सड़क हादसों में होने वाली मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं। हर मौत के पीछे एक परिवार का उजड़ना, माता-पिता के सपनों का टूटना और समाज की एक संभावनाशील शक्ति का समाप्त होना छिपा होता है। युवा देश की रीढ़ होते हैं। उनकी असमय मृत्यु न केवल परिवार, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अपूरणीय क्षति है।
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए हमें व्यक्तिगत, सामाजिक और संस्थागत—तीनों स्तरों पर प्रयास करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर हर चालक को यह संकल्प लेना होगा कि वह नियमों का पालन करेगा और दूसरों की सुरक्षा का सम्मान करेगा। सामाजिक स्तर पर हमें सुरक्षित ड्राइविंग को संस्कार के रूप में अपनाना होगा। और संस्थागत स्तर पर कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतर जागरूकता की आवश्यकता होगी। अंततः, सड़क पर सुरक्षित रहना केवल अपनी जान बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि यह मानवता और जिम्मेदारी का प्रश्न है। थोड़ी-सी सावधानी, धैर्य और अनुशासन न जाने कितनी जिंदगियों को बचा सकता है। अगर हम आज नहीं चेते, तो कल यह त्रासदी किसी भी घर का दरवाज़ा खटखटा सकती है। युवाओं की ज़िंदगी अनमोल है—इसे लापरवाही की भेंट चढ़ने से बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
हिसार (हरियाणा)





