
यह आलेख बसंत पंचमी के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व को रेखांकित करता है। इसमें माँ सरस्वती की आराधना, ऋतु परिवर्तन से मिलने वाली जीवन प्रेरणा, तथा भारतीय परंपरा में बसंत के उल्लास और चेतना के संदेश को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
- बसंत पंचमी पर माँ वीणावादनी का गुणगान
- ऋतु परिवर्तन और जीवन दर्शन की प्रतीक बसंत
- उत्तराखंड की धरती पर बसंत का उत्सव
- ज्ञान, कला और चेतना का पर्व बसंत पंचमी
भुवन बिष्ट
रानीखेत, उत्तराखंड
पतझड़ के बाद बसंत का आगमन हमें जीवन के बदलते क्षणों का ज्ञान कराता है वहीं पीताबंरी ओढ़े धरा में इस समय बसंत की बहार है। बसंत पंचमी पर माँ वीणावादनी का चहुँ ओर गुणगान होता है,और लेखक, रचनाकार, कलाकार, कवि, विद्यार्थी हर कोई माता शारदे का आशीष पाने के लिए हर समय तैयार रहता है। कहा जाता है “जहां सुमति तहां संपति नाना”अर्थात जहां ज्ञान है अच्छी बुद्धि है वहां संसार की हर संपति है और यह सुमति देने वाली है माता सरस्वती,माता शारदे,माता वीणावादनी। ज्ञानप्रदायनी, बुद्धि,सदमार्ग वाणी देने वाली मां वीणावादनी की आराधना की जाती है बसंत पंचमी पर। पितांबर ओढ़े हुवे धरती फूलों से लहलहाते खेत खलिहान, पेड़ मानो हमें सुख-दुःख बीतने का भी ज्ञान कराते हैं क्योंकि पतझड़ बीतने केे बाद बसंत आ जाता है। बसंत का अभिनंदन पूरे हर्षोल्लास के साथ बसंत पंचमी पर किया जाता है।
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देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों पर फूलदेई त्यौहार के लिए भी धरा सज धज कर तैयार हो जाती है। बसंत ऋतु जीवन में हमें साहस का ज्ञान भी कराती है क्योंकि पतझड़ बीतने के बाद बसंत बहार का पाठ हमें पढ़ाती हैं संकट विपत्ती विषम परिस्थिति कैसी भी विकट हो उसे भी एक दिन बितना ही है पतझड़ की तरह। भले ही कठिनाइयों के पल में हमें अधिक साहस की आवश्यकता होती है फिर भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। हर त्यौहार हमें कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।बसंत पंचमी पर माता सरस्वती की पूजा भारत सहित कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है।इस दिन स्त्रियाँ,बच्चे पीले वस्त्र धारण करती हैं। वसंत सदैव ही लोगों का सबसे मनचाहा मौसम रहा है। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं।
वसंत ऋतु का स्वागत में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा भी होती है। यह वसंत पंचमी का त्यौहार हर मन में उमंग उल्लास को समेटे हुए है। बसंत पंचमी कथा सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी।
तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।माता सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। बसंत पर्व का महत्व वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।
यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, रचनाकार, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं , मां सरस्वती मां वीणावादनी ही बुद्धि ज्ञान प्रदान करने वाली है। हमारी भारत भूमि से अज्ञानता का अंधकार मिटे और हर घर घर में मां सरस्वती का वास हो और ज्ञान का संचार हो । मां शारदे बसंत ऋतु की तरह सभी के जीवन में खुशहाली भर दे । भारत भूमि व समाज निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर रहे।
।। जय मां वीणावादनी ।।
बसंत ऋतु जीवन में हमें साहस का ज्ञान भी कराती है क्योंकि पतझड़ बीतने के बाद बसंत बहार का पाठ हमें पढ़ाती हैं संकट विपत्ती विषम परिस्थिति कैसी भी विकट हो उसे भी एक दिन बीतना ही है पतझड़ की तरह। भले ही कठिनाइयों के पल में हमें अधिक साहस की आवश्यकता होती है फिर भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। हर त्यौहार हमें कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।







