
यह कविता भारतीय प्रजातंत्र की वर्तमान स्थिति पर तीखा और विचारोत्तेजक प्रश्न खड़ा करती है। भूख, बेघरपन, धर्म-जाति की राजनीति, भ्रष्टाचार और संवैधानिक मूल्यों के क्षरण को रेखांकित करते हुए यह रचना सोई हुई चेतना और निष्क्रिय कर्णधारों पर करारा प्रहार करती है। कविता लोकतंत्र के आदर्श और यथार्थ के बीच बढ़ती दूरी को मार्मिक ढंग से उजागर करती है।
- लोकतंत्र की दरारें और संविधान की पीड़ा
- धर्म, जाति और सत्ता के बीच फँसा प्रजातंत्र
- प्रश्नों से घिरा भारतीय गणतंत्र
- सत्ता, भ्रष्टाचार और सोई हुई चेतना
डॉ. प्रियंका सौरभ
आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)
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भारत के गणतंत्र की,
ये कैसी है शान।
भूखे को रोटी नहीं,
बेघर को पहचान॥
सब धर्मों के मान की,
बात लगे इतिहास।
एक-दूजे को काटते,
ये कैसा परिहास॥
प्रजातंत्र का तंत्र अब,
लिए खून का रंग।
धरम-जात के नाम पर,
छिड़ती देखो जंग॥
पहले जैसे कहाँ रहे,
संविधान के मीत।
न्यारा-न्यारा गा रहा,
हर कोई अब गीत॥
विश्व पटल पर था कभी
भारत का सम्मान।
लोभी नेता देश के,
लूट रहे वह मान॥
रग-रग में पानी हुआ,
सोये सारे वीर।
कौन हरे अब देश में
भारत माँ की पीर॥
मुरझाये से अब लगे,
उत्थानो के फूल।
बिखरे है हर राह में,
बस शूल ही शूल॥
आये दिन ही बढ़ रहा,
देखो भ्रष्टाचार।
वैद्य ही जब लूटते,
करे कौन उपचार॥
कैसे जागे चेतना,
कैसे हो उद्घोष।
कर्णधार ही देश के,
लेटे हो बेहोश॥
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)






