
दिल्ली की सड़कों पर लगा एक पोस्टर, जिसमें मुख्यमंत्री के नाम के साथ लाईट पोल तक का श्रेय दर्शाया गया है, सोशल मीडिया में चर्चा और हास्य का विषय बन गया है। यह तस्वीर राजनीति में बढ़ती व्यक्तिगत ब्रांडिंग और श्रेय लेने की प्रवृत्ति को उजागर करती है। साथ ही यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या विकास कार्यों को व्यक्ति-विशेष से जोड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है।
- जब विकास कार्य भी प्रचार का औज़ार बन जाए
- नाम की राजनीति और श्रेय की होड़
- सोशल मीडिया में वायरल पोस्टर, सियासत पर सवाल
- क्या लोकतंत्र में व्यक्तिगत ब्रांडिंग जरूरी है?
- मुख्यमंत्री पद की गरिमा और सार्वजनिक धन का संदेश
राज शेखर भट्ट
लोकतंत्र में दृश्य प्रतीकों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन जब ये प्रतीक जनहित से अधिक व्यक्तिगत प्रचार का माध्यम बन जाएँ, तब वे सवालों के घेरे में आ जाते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर इसी विमर्श को जन्म देती है। फोटो में सड़क किनारे लगे एक पोस्टर पर स्पष्ट रूप से लिखा है— “यह लाईट पोल सहित रेखा गुप्ता जी, मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार के फण्ड द्वारा लगाई गई है।” यह पंक्ति जितनी साधारण दिखती है, उतनी ही गहरी राजनीतिक परतें अपने भीतर समेटे हुए है।
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आमतौर पर सार्वजनिक धन से किए गए कार्यों को सरकार या विभाग के नाम से जोड़ा जाता है, न कि सीधे किसी व्यक्ति विशेष के नाम से। लेकिन यहाँ स्थिति उलट दिखाई देती है—मानो यह बताना आवश्यक हो गया हो कि शासनकाल में हुआ हर कार्य, चाहे वह एक लाईट पोल ही क्यों न हो, मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पहचान से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर यह तस्वीर लोगों के लिए हास्य का विषय बन गई है। फेसबुक, व्हाट्सऐप और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लोग इसे व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के साथ साझा कर रहे हैं। कोई इसे ‘श्रेय लेने की राजनीति’ बता रहा है, तो कोई इसे सत्ता की असुरक्षा का प्रतीक मान रहा है।
दरअसल, जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या शासन का उद्देश्य नाम चमकाना है या व्यवस्था को मजबूत करना? राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन अब इसका स्वरूप अधिक खुला और दृश्यात्मक हो गया है। पहले शिलान्यास पट्टिकाओं तक सीमित रहने वाला नामकरण अब रोज़मर्रा के बुनियादी ढांचे तक पहुँच गया है। इससे यह संदेश जाता है कि सत्ता में बैठा व्यक्ति यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भविष्य में कोई भी उपलब्धि किसी पूर्ववर्ती सरकार या अन्य राजनीतिक दल से न जुड़ जाए।
संवैधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पद की गरिमा और सार्वजनिक धन की मर्यादा का विशेष ध्यान रखे। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन विकास कार्य जनता के होते हैं, किसी एक व्यक्ति के नहीं। जब विकास को व्यक्तिगत प्रचार से जोड़ा जाता है, तो यह लोकतांत्रिक भावना को कमजोर करता है। यह तस्वीर एक तरह से राजनीति के बदलते चरित्र की भी गवाही देती है—जहाँ काम से अधिक उसका श्रेय महत्वपूर्ण हो गया है। कहीं ऐसा न हो कि सार्वजनिक पेयजल योजना के अन्तर्गत मरम्मत का कार्य किये जाने पर भी संबंधित सरकार शहर में बोर्ड लगा दे कि ‘‘इन नलों में वासर के साथ मरम्मत का कार्य मुख्यमंत्री के फण्ड से किया गया है।’’
शायद यही कारण है कि लोग इसे केवल एक पोस्टर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। संदेश यह कि राजनीति अब ‘हमने किया’ से आगे बढ़कर ‘मैंने किया’ की ओर बढ़ रही है। अंततः, यह फोटो हमें सोचने पर मजबूर करती है कि लोकतंत्र में असली ताकत नाम में नहीं, भरोसे में होती है। जनता विकास देखती है, पोस्टर नहीं। और जब पोस्टर विकास से बड़ा हो जाए, तब हँसी के साथ-साथ गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं।








