
राजीव कुमार झा
जिंदगी के सफर में
उसे यहां अब कहां भूल पाता हूं
रोज तुमको राह में देखता
शाम में घर लौट आता हूं
तुम चली गयी
क्या सबको छोड़ कर अकेले
जिंदगी के मेले सब रह गये अकेले
सिनेमा देखने में अब मन नहीं लगता
रोज उदास देखकर कोई कुछ भी नहीं कहता
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यहां आदमी अब अपने काम से
घर के बाहर निकलता
किसको ढूंढ़ने, कहां जाना है
यह सबसे पहले अपने आपको बताना है
अरी प्रिया !
आखिरकार भगवान की इच्छा के सामने
सर झुकाना है
रात में चांद को छत पर बुलाना है
हवा तुम्हें शाम में देखकर आयी
जंगल में सुबह रोशनी आयी
मुंडेर पर चिड़िया चहचहाई
आकाश में लालिमा छाई
मंदिर में गांव की औरतें, गीत गाने आयीं
दोपहर में कितनी कड़ी धूप छायी
चिड़िया घोंसले में लौट आयी
राह सूनी हो गयी शाम आकर, तालाब में झिलमिलाई
रात पास आयी, समुद्र के ऊपर चांदनी गुनगुनायी
तट के किनारे हिलोरें देती सुनाई
तुम कहीं भी यहां नजर नहीं आयी
घर से जाते किसी को कुछ
लौटने के बारे में कह नहीं पायी
मन की चुप्पी सी कोई आवाज, अब कहां देती सुनाई
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »राजीव कुमार झाकवि एवं लेखकAddress »इंदुपुर, पोस्ट बड़हिया, जिला लखीसराय (बिहार) | Mob : 6206756085Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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