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कविता : विक्टोरिया मेमोरियल… बरसात का मौसम बीत गया तुम्हारे पास आकर अब यह मन कितना चंचल हो उठा धरती पर मिट्टी महक रही अकेली चिड़िया किसी छत से उड़कर कहीं चल पड़ी जंगल में धूप हंसने लगी तुम्हारे रेशमी गालों पर प्यार की लालिमा छा रही #राजीव कुमार झा
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बेहद सुंदर
जीवन तुम्हारे पास
आकर
ऐसा लगता
मानो जाड़े के
मौसम में कोलकाता के
विक्टोरिया मेमोरियल में
ठहरा हुआ मन
यहां के बाग बगीचों में
कहीं बैठा अकेला
धूप भरे मौसम की
आहटें सुनता मचलता
यादों में तुम्हारी हंसी
अक्सर गूंज जाती
प्यार भरी चिट्ठियों को
लेकर
इसी वक्त हवा
हरी भरी घास पर
बैठकर
समंदर को बताती
सदियों से तुम
मेरे मन के भीतर
निर्झरनी सी बहती
बहुत प्रेम से
अपने मन की बातें
कहती
आकुल अंतर में
बसी रही हो
बहुत दिनों के बाद
आज तुम आई
तुमको सबसे पहले
नवरात्र की बधाई
शरद ऋतु का चांद
तुम्हें देखकर कहता
अरी प्रिया
आज रात में
तुमसे मिलना
सबसे सुंदर सागर को
लगता
अब तुम यौवन की
रूप माधुरी हो
कोई एक फूल
अब मन में महकता
तुम्हें सितारों के साथ
देखकर
हरसिंगार सुबह
किसी को
कुछ भी नहीं कहता
धूप निकल आती
तुम नहाने नदी के
किनारे
अकेली चली जाती
हवा तुम्हारे
भीगे तन मन के पास
गुनगुनाती
तुम रज की महक में
आकंठ डूब जाती
रात अब बिल्कुल
ख़ामोश हो गयी
बरगद के पेड़ की
डालियों के नीचे
नदी चैन से सो रही
चांदनी
खिड़कियों पर आकर
हंस रही
बरसात का मौसम
बीत गया
तुम्हारे पास आकर
अब यह मन
कितना चंचल हो उठा
धरती पर मिट्टी
महक रही
अकेली चिड़िया
किसी छत से उड़कर
कहीं चल पड़ी
जंगल में धूप
हंसने लगी
तुम्हारे रेशमी गालों पर
प्यार की
लालिमा छा रही
एक नज़र भरकर
तुम्हें सब आंखों में
बसा लेते
प्यार का पैगाम सुनकर
अपनी नज़रें छिपा लेते
सपनों की रानी
प्यार के दामन में
तुम सबसे ज्यादा
अब लगती सयानी
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