
बेरोजगार
गणपत लाल उदय, अजमेर, राजस्थान
ना-जाने अब कब मिलेगा मुझको अपना रोज़गार,
सवाल बहुत शर्मिन्दा करता मुझको कभी-कभार।
गांव छोड़कर शहर आ गया फिर भी हूं बेरोजगार,
डिग्री लिए घूम रहा हूं जहां दिखें ख़बर अखबार।।
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बड़ी विचित्र लगी यह परीक्षा चतुर्थश्रेणी कर्मचारी,
इंजीनियर्स व लॉ ग्रेजुएटों की भीड़ थी बड़ी भारी।
पर्स रुमाल भी बाहर रखवाया निभाया जिम्मेदारी,
शांति पूर्ण ढंग से हुई ये परीक्षाएं पारी दर पारी।।
चालिस साल के अभ्यर्थी भी थे जिसमें ये शामिल,
सैकड़ों पेपर दे चुका पर दहला दिया इसी ने दिल।
दसवीं पास की वैकेंसी थी पर दसवीं पास थे कम,
बीएड-बीटेक-पीएचडी वालों ने भी किया ट्रायल।।
सभी परीक्षा की लगभग मैं भरसक करता तैयारी,
भूख, गरीबी, लाचारी जैसे मुद्दे किस्मत में हमारी।
एक बार तो मन में आता है लगा लू चाट का ठेला,
इन नेत्रों में अब चुभने लगी है हमारी यह बेकारी।।
नहीं चाहिए मुझे धन-दौलत, मिल जाए अल्पाहार,
जीवन गुजर-बसर हो जाए, भूखा न सोए परिवार।
लिख रहा हूं ये रचना क्योंकि मन में आया विचार,
कोशिश सदा करते ही रहूंगा, मानूंगा नहीं ये हार।।









