
यह कविता सीमा पर तैनात जवानों के अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति को समर्पित है। कठिन मौसम, घोर अंधकार और प्राणघातक परिस्थितियों में भी वे देश की अखंडता की रक्षा करते हैं। रचना सैनिकों के बलिदान और स्वाभिमान को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है।
- तिरंगे की शपथ और जवानों का संकल्प
- माइनस डिग्री तापमान में भी अडिग हौसले
- रातभर जागकर देश की रखवाली
- वर्दी में छुपी बलिदान की कहानी
सैनिक की कलम से
गणपत लाल उदय, अजमेर, राजस्थान
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जिनकी वज़ह से है सुरक्षित हिन्दुस्तान यह हमारा,
हर विघ्न पार कर लेते है चाहें माइनस डिग्री पारा।
बारम्बार सलाम है उनकी देश सेवा को यह हमारा,
नही कभी थका हुआ पाया न शत्रु से कभी हारा।।
रात रातभर जागकर सीमा पर देता रहता ये पहरा,
महफूज़ रखता वसुंधरा को चाहें घाव हो ये गहरा।
रोक न पाता इन्हें कोहरा घनघोर रातों का अन्धेरा,
बहादुरी और वीरता की छाप छोड़ देता ये चेहरा।।
कांप जाता है जहां ये हृदय वहां पर भी डटा रहता,
सांस लेना भी दूभर वहां फ़र्ज़ निभाता यही रहता।
करता-रहता स्वीकार चुनौतियां जागते रहो कहता,
देश अखंडता के लिए हजारों कष्टों को ये सहता।।
श्वसन देश के नाम है इनका ख़ून रगो में जो बहता,
एक भी जवान पीछे नही हटता आगे बढ़ते रहता।
एक गोली, एक दुश्मन मारता ना परवाह ये करता,
शपथ तिरंगे की लेकर हर तूफ़ान ये सहते रहता।।
होते स्वाभिमानी एवं बलिदानी सुनें इनकी ज़ुबानी,
राष्ट्र की धड़कन कहलाते इतिहास में कई कहानी।
बस जीत का परचम लहराते देनी पड़े यह कुर्बानी,
वर्दी संग बेल्ट, टोपी लगते ही आ जाती जवानी।।








