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कविता : नदिया की धारा, उसने प्यार लुटाया मानो सुबह धूप बरसती हो तुम मन की बातें करती हो खूब अकेली रहती हो इंतजार करती सबसे कहती हो कोई नहीं हमारा शिथिल वेग से बहती नदिया की धारा #राजीव कुमार झा
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मेरे प्यार
शाम की
उन मुलाकातों के
साथ
कोई कैसे करता
प्यार से इंकार
बारिश की बौछार
भींग गया
तन मन तुम्हारा
अकेला आज बना
मन
लौट रहा घर
हारा हारा
आंधी में टूटा
घर द्वार हमारा
नदिया में
उथल पुथल से
भरी हिलोरें
अपनी इन गंदी
आदत को
हम कैसे छोड़ें
झूठा जो भी रहा
प्यार में
फैल रहा आसमान में
जहर बना धुआं सारा
तुमको
किसने आज पुकारा
उसने प्यार लुटाया
मानो सुबह
धूप बरसती हो
तुम मन की बातें
करती हो
खूब अकेली रहती हो
इंतजार करती
सबसे कहती हो
कोई नहीं हमारा
शिथिल वेग से बहती
नदिया की धारा








