
राजीव कुमार झा
यह अकेलापन
कितना हमारा
मन से इतने
दिनों तक
साथ रहकर
अब दूर रहना
राह में
गुजरते देखकर भी
इस कदर
कुछ कहना
मानो अब खुद को
अब पहचानते ही
नहीं हों
काश ! हम कभी
फिर कहीं पर
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होकर
अकेले
स्वप्न में
जो याद आते
दूर गांव के
उजड़े हुए मेले
अरी प्रिया !
संग तुम्हारे
यहां घूमने चलते
रात की
उसी नदी को
हमने तब देखा
यहां बहते
सुबह सूरज
फिर उगेगा
गुलाब का फूल
उसी उपवन में
फिर खिलेगा
बरसात का मौसम
चला आया
नदी का सुंदर
किनारा
तुम जीवन की
सरस धारा
अब कहां धरती
अकेली
रोज बारिश में
महके चमेली
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »राजीव कुमार झाकवि एवं लेखकAddress »इंदुपुर, पोस्ट बड़हिया, जिला लखीसराय (बिहार) | Mob : 6206756085Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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