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हे दीपक की लौ, हर किसी के दिलों में सहनशीलता, धैर्य और संयम की ज्योति जला दे। हे दीपक की लौ, तू कोई साधारण लौ नहीं, मानव को मानवता का पाठ पढ़ाने वाली ज्योति है।
सुनील कुमार माथुर
(सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच — स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान)
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हे दीपक की लौ,
तू हर दिल को दिल से मिला दे।
तेरी जगमगाती लौ,
हर प्राणी के मन से काम, क्रोध,
लोभ और मोह को मिटा दे।
प्यार, स्नेह, दया और ममता का
लोगों के दिलों में संचार कर दे।
हर तिराहे और चौराहे पर
राह भटके युवाओं को
एक नई राह दिखा दे।
हे दीपक की लौ,
हर किसी के दिलों में
सहनशीलता, धैर्य और संयम की
ज्योति जला दे।
हे दीपक की लौ,
तू कोई साधारण लौ नहीं,
मानव को मानवता का
पाठ पढ़ाने वाली ज्योति है।
तू हो तो हर घर में हर रोज
दीपावली ही दीपावली है।
बस तेरी ज्योति की लौ
कभी मंद न पड़ पाए।
जैसे तू पूजा घर में जगमगाती है,
वैसे ही हर व्यक्ति के
हृदय में जगमगाती रह।
यही इस कलमकार की
तुमसे हाथ जोड़कर विनती है।









