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तल्खियां जो भी रहीं, छोड़ो चलो अब जाने दो। प्रेम पथ पर सहपथिक बनकर मैं चलना चाहता हूँ। रूठना और फिर मनाना प्रेम के ही रूप हैं। बन पुजारी प्रेम का, जीवन बिताना चाहता हूँ।
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विजय कनौजिया
प्रेम के परिप्रेक्ष्य में
मैं कुछ बताना चाहता हूँ।
आज तुम बैठो जरा,
मैं कुछ सुनाना चाहता हूँ।
दो मुझे अधिकार थोड़ा
स्वीकृति के रूप में,
आज मैं तुमसे वही फिर
हक जताना चाहता हूँ।
हैं उमड़ते आजकल
बादल मेरे जज़्बात के,
हाथ कंधे पर रखो,
मैं आज रोना चाहता हूँ।
तल्खियां जो भी रहीं,
छोड़ो चलो अब जाने दो।
प्रेम पथ पर सहपथिक
बनकर मैं चलना चाहता हूँ।
रूठना और फिर मनाना
प्रेम के ही रूप हैं।
बन पुजारी प्रेम का,
जीवन बिताना चाहता हूँ।
जीवन बिताना चाहता हूँ।
विजय कनौजिया
ग्राम व पत्रालय-काही, जनपद-अम्बेडकर नगर-224132, उत्तर प्रदेश









