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कविता : घरौंदा, सबके बीच बेपरवाह रहती उसी सुनसान से निकल कर कोई दरिया धूप में बहती यहां हवा की अदा अनोखी जिंदगी का कारवां गुज़रता चला जाता अक्सर शहर में गुम तुम्हारा चेहरा याद आता… #राजीव कुमार झा
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हसरतों ने
तुम्हें गुलजार करके
जिंदगी के सफ़र में
रोज आकर
खुशियों से रंग भरती
अपने भरोसे
सबके बीच बेपरवाह
रहती
उसी सुनसान से
निकल कर
कोई दरिया धूप में
बहती
यहां हवा की अदा
अनोखी
जिंदगी का कारवां
गुज़रता चला जाता
अक्सर
शहर में गुम
तुम्हारा चेहरा
याद आता
कोई कुछ भी पूछने पर
कभी नहीं बताता
उसी रेत पर घरौंदा
लहरों के संग
हवा खिलखिलाती चली
आती
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