कविता : पुस्तक की पीड़ा

सुनील कुमार माथुर
एक दिन पुस्तक मुझ से बोली ,
‘हे कवि एवं लेखक महोदय ,
कभी हमारी भी सुध लिया करों
लंबे अर्से से अलमारियों में
हम कैदी की तरह ब़ंद पडी हैं
जब से मोबाइल और इंटरनेट आया हैं
तब से हम अलमारियों में बंद पडी है
हमें कोई छूने वाला भी नहीं है
हे कवि बंधु ! जरा हमारी भी सुन लों
बच्चों को पुस्तकों का महत्व बताइयें
हम बच्चों की सच्ची दोस्त हैं
प्रेरणा की मूर्त है , ज्ञान की सागर है
हें कवि बंधु ! इन अलमारियों से हमें
तुम मुक्ति दिला दीजिए
हम आपकी जीवन भर आभारी रहेगें चूंकि
जो आनंद आजादी में है
वह आनंद बंदिश में नहीं
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¤ प्रकाशन परिचय ¤
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From »सुनील कुमार माथुरलेखक एवं कविAddress »33, वर्धमान नगर, शोभावतो की ढाणी, खेमे का कुआ, पालरोड, जोधपुर (राजस्थान)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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