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कविता : धनतेरस का श्रृंगार… धनतेरस में बाजार में आकर तुम्हारा मन जगा है। तुमने लक्ष्मी गणेश की मूर्ति बाजार से खरीदकर लाने के लिए कहा है लोग दीवाली का दीया जलाकर… #राजीव कुमार झा
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प्यार के रंग
सुरभित गीतों से
नयनों में अलसाये
धूप तपे अंग
शरद में
तुम महक रही
याद आये
वे दिन तुम्हारे संग
अपनी जिंदगी में
सहज प्रेम का वैसे ही
सजा है
बारिश के सरस प्रेम का
रंग
धनतेरस में
बाजार में आकर
तुम्हारा मन जगा है।
तुमने लक्ष्मी गणेश की
मूर्ति
बाजार से खरीदकर
लाने के लिए कहा है
लोग दीवाली का दीया
जलाकर
फूलझड़ियों की रोशनी में
आज जिंदगी को देखते
अरी प्रिया
तुम रात की रानी
आज श्रृंगार करके
तुम लगती बेहद सयानी
लेखनी को पलने और बढ़ने का माहौल देता उत्तराखंड का ‘लेखक गांव’









