
सुनील कुमार माथुर
बिल्ली मौसी, बिल्ली मौसी,
तुम कितनी सयानी हो।
घर-घर में घूम-घूम कर
तुम हर रोज़ भगोने में से
दूध-मलाई चट कर जाती हो।
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बच्चों के हक की दूध-मलाई खाकर
तुम मोटी-ताज़ी हो रही हो।
कहीं यह मोटापा
तुम्हारे जी का जंजाल न बन जाए।
जिस दिन बच्चों की हाय
तुम को लग गई,
उस दिन तुम्हारी खैर नहीं।
बिल्ली मौसी, बिल्ली मौसी,
तुम कितनी सयानी हो।
घर-घर में घूम-घूम कर
तुम हर रोज़ भगोने में से
दूध-मलाई चट कर जाती हो।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान









