
यह लेख ईश्वर भक्ति में निस्वार्थ भाव और सद्कर्म की महत्ता पर प्रकाश डालता है। लेखक बताते हैं कि स्वार्थपूर्ण पूजा के बजाय निर्मल हृदय, दया और श्रेष्ठ कर्म ही सच्ची ईश्वर कृपा का मार्ग हैं। समाज में सकारात्मक आचरण और निंदा से दूर रहने का संदेश भी दिया गया है।
- स्वार्थ से नहीं मिलती कृपा
- कर्म, संस्कार और सच्ची पूजा
- निर्मल हृदय ही श्रेष्ठ तीर्थ
- निंदा नहीं, सद्कर्म अपनाएँ
सुनील कुमार माथुर
आज के समय में व्यक्ति परमात्मा की पूजा-अर्चना तो करता है, लेकिन वह निस्वार्थ भाव से प्रभु की पूजा नहीं करता है। वह अपने स्वार्थ की खातिर धर्मस्थलों पर जाता है और चढ़ावा चढ़ाता है। यही वजह है कि वह हमेशा परेशानियों से घिरा रहता है। परमात्मा को लोग दो रुपए चढ़ाकर दो लाख व दो करोड़ का लाभ मांगते हैं। यह कैसी विडंबना है। उस परमसत्ता को सब मालूम है कि किसे कब क्या और कितना देना है। बस आप तो निस्वार्थ भाव से उसकी पूजा-अर्चना करते रहिए और फल की इच्छा उस पर छोड़ दीजिए। उस दिन तुम्हारी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी, जिस दिन तुम्हें यह पता चल जाएगा कि ईश्वर की कृपा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।
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सदियों से हम देखते चले आ रहे हैं कि परीक्षा अकेले में होती है और उसका परिणाम सबके सामने आता है। इसलिए कोई भी कर्म करने से पहले उसके परिणाम पर विचार जरूर करें। अर्थात जीवन में ऐसे कर्म करें कि आपकी अनुपस्थिति में भी लोग आपके कार्यों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करें। जब कोई कार्य हमें ही करना है तो फिर हंसते-हंसते कीजिए। चेहरे पर लाचारी के भाव क्यों? कर्म ऐसे करो कि जो लोग आपको नहीं जानते हैं, वे भी आपके नेक कर्मों की सराहना करते हुए प्रसन्न रहें। यह प्रसन्नता ही है जो इंसान को इंसान के पास लाती है।
इस नश्वर संसार में बुराई करने वालों की कोई कमी नहीं है। आप कितना भी श्रेष्ठ कर लीजिए, बेहतर से बेहतर कर लीजिए, लेकिन वे उसमें भी कमियां ढूंढने का प्रयास करते रहते हैं। इसलिए किसी की भी बात को दिल पर मत लीजिए। जिसके जैसे संस्कार होते हैं, वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। लेकिन आपको हमेशा श्रेष्ठ से श्रेष्ठ समाज को देने का प्रयास करते रहना चाहिए। तभी समाज का हित होगा।
कहते हैं कि तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ तीर्थ आपका हृदय है। यह जितना निर्मल और निष्पाप होगा, उतने ही सारे तीर्थ आपके पास होंगे। इसलिए इंसान को छल-कपट, झूठ-फरेब, चुगली-चकारी, निंदा जैसे अवगुणों से दूर रहना चाहिए। हमेशा दया, करुणा, ममता, वात्सल्य का भाव जीवन में रखना चाहिए। वात्सल्य भाव के कारण ही हमारे रिश्ते प्रगाढ़ होते हैं। इसलिए जीवन में कभी भी किसी की निंदा न करें। चूंकि निंदा करने से कुछ भी हासिल नहीं होता है, अपितु इससे समाज में हमारी ही शाख, प्रतिष्ठा, गरिमा धूमिल होती है। यही वजह है कि विद्वान लोग कहते भी हैं कि शब्द चाहे कैसे भी हों, मन खुश करें तो अर्थ है, वरना सब व्यर्थ है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान






