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उत्तराखंड सरकार ने अमरावती मॉडल अपनाकर भूमि के बदले विकसित भूमि देने का निर्णय लिया है। विकसित प्लाट न मिलने पर भू-स्वामियों को सर्किल रेट का दोगुना या तीन गुना मुआवजा मिलेगा, जिससे राज्य में निवेश और शहरी विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
- भू-स्वामियों को मिलेगा 24% विकसित आवासीय प्लाट, वाणिज्यिक के लिए 7% का प्रावधान
- विकसित प्लाट न मिलने पर आवासीय के लिए दोगुना, वाणिज्यिक के लिए तीन गुना सर्किल रेट
- लैंड पूलिंग में कृषि भूमि पर 6 रुपये और गैर-कृषि पर 12 रुपये प्रति वर्गमीटर प्रति माह सहायता
- दिल्ली और हरियाणा के सफल मॉडलों के आधार पर तैयार की गई उत्तराखंड की संशोधित लैंड पूलिंग स्कीम
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने राज्य में औद्योगिक निवेश, नए शहरों के विकास और योजनाबद्ध शहरी विस्तार के उद्देश्य से बड़ा और दूरगामी फैसला लिया है। प्रदेश ने आंध्र प्रदेश के अमरावती मॉडल को आधार बनाते हुए भूमि के बदले भूमि देने की व्यवस्था अपनाई है, जिसके तहत भू-स्वामियों को उनकी जमीन के बदले विकसित आवासीय या वाणिज्यिक प्लाट उपलब्ध कराए जाएंगे। विकसित प्लाट उपलब्ध न होने की स्थिति में भू-स्वामियों को सर्किल रेट का दोगुना या तीन गुना मुआवजा प्रदान किया जाएगा। इसे उत्तराखंड में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।
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मुख्य सचिव आवास मीनाक्षी सुंदरम ने बताया कि संशोधित लैंड पूलिंग स्कीम के तहत भू-स्वामियों से कृषि या अविकसित भूमि ली जाएगी और उसके बदले 24 प्रतिशत विकसित आवासीय भूमि प्रदान की जाएगी। यदि कोई भू-स्वामी विकसित वाणिज्यिक प्लाट लेना चाहता है, तो उसकी सरेंडर की गई भूमि के सात प्रतिशत के बराबर विकसित वाणिज्यिक प्लाट दिया जाएगा। यदि भू-स्वामी वाणिज्यिक प्लाट नहीं लेना चाहता, तो उसे 14 प्रतिशत अतिरिक्त आवासीय प्लाट की सुविधा दी जाएगी। विकसित भूमि न मिलने पर आवासीय प्लाट के बदले दोगुना और वाणिज्यिक प्लाट के बदले सर्किल रेट का तीन गुना मुआवजा प्रदान किया जाएगा।
इस योजना के तहत भूमि पूलिंग स्कीम में शामिल प्रत्येक भू-स्वामी को भूमि सौंपने की तारीख से अधिकतम तीन वर्ष तक प्रति माह सहायता राशि भी दी जाएगी। गैर-कृषि भूमि पर 12 रुपये प्रति वर्गमीटर प्रति माह और कृषि भूमि पर छह रुपये प्रति वर्गमीटर प्रति माह आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। यह सहायता तब तक दी जाएगी, जब तक भू-स्वामी को उसके आवंटित प्लाट का स्वीकृत नक्शा (प्लान) उपलब्ध नहीं हो जाता।
उत्तराखंड आवास एवं शहरी विकास प्राधिकरण के संयुक्त मुख्य प्रशासक डीपी सिंह ने बताया कि यह मॉडल दिल्ली और हरियाणा की लैंड पूलिंग नीतियों की ही तरह तैयार किया गया है, जहां भूमि के बेहतर उपयोग से बड़े पैमाने पर शहरी विकास संभव हुआ। उन्होंने बताया कि दिल्ली में करीब 20,000 हेक्टेयर भूमि लैंड पूलिंग पॉलिसी के तहत विकसित की गई, जिससे 60,000 करोड़ रुपये से अधिक का निजी निवेश आया। हरियाणा में भी इसी मॉडल के आधार पर शहरी विस्तार और औद्योगिक कारीडोर का विकास संभव हुआ है। उत्तराखंड में भी इसी सफलता को दोहराने का प्रयास किया जा रहा है।
राज्य में संशोधित लैंड पूलिंग स्कीम का उद्देश्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, नए शहरी सेगमेंट, सेटेलाइट टाउन, स्मार्ट शहरों और योजनाबद्ध शहरी विस्तार के लिए एक मजबूत फ्रेमवर्क तैयार करना है। यह पूरी तरह से स्वैच्छिक स्कीम है, जिसमें भू-स्वामी अपनी सहमति से भूमि देंगे और इसके एवज में उन्हें विकसित भूमि या वित्तीय लाभ दोनों उपलब्ध रहेंगे।
भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी चरणबद्ध तरीके से निर्धारित की गई है। सबसे पहले संभावित क्षेत्र की पहचान होगी, फिर भू-चयन कर लैंड पूलिंग की सीमा तय की जाएगी। अथॉरिटी द्वारा ड्राफ्ट लेआउट, भौतिक अध्ययन, जन-सुनवाई और सार्वजनिक परामर्श के बाद आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। स्क्रूटनी और स्वीकृति के बाद फाइनल लैंड पूलिंग स्कीम प्रकाशित होगी। इसके बाद मूल प्लाट का भौतिक कब्जा लिया जाएगा और भू-स्वामी को नए विकसित प्लाट देने के लिए संबंधित डीड तैयार और निष्पादित की जाएगी। यही प्रक्रिया पूरी होने के बाद लैंड पूलिंग स्कीम का पूर्ण क्रियान्वयन होगा।
उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय न सिर्फ भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाएगा, बल्कि भू-स्वामियों को सुरक्षा, लाभ और सम्मान के साथ विकास के केंद्र में लाने का भी काम करेगा। राज्य में आगामी वर्षों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, औद्योगिक निवेश और आधुनिक शहरीकरण को गति मिलने की उम्मीद है।





