
भारतीय राजनीति में सत्ता के साथ नेताओं की संपत्ति अस्वाभाविक रूप से बढ़ती है, जबकि इसकी प्रभावी जांच शायद ही होती है। न्याय व्यवस्था की यह असमानता आम नागरिक के लोकतंत्र और कानून पर भरोसे को कमजोर करती है।
- सत्ता, संपत्ति और सवालों से दूर नेता
- लोकतंत्र में नेताओं की दौलत और जनता की बेबसी
- जब जनसेवा सत्ता-संपत्ति का साधन बन जाए
- आम आदमी बनाम ताकतवर नेता: न्याय का दोहरा मापदंड
भारतीय राजनीति हमेशा से ही ‘जन-सेवा’ और ‘लोक-हित’ के वादों से भरी रही है। लेकिन वास्तविकता इससे बहुत अलग है। जैसे ही कोई नेता सत्ता में आता है, उसकी संपत्ति में अप्राकृतिक और तेज़ वृद्धि देखने को मिलती है। ज़मीन, मकान, बैंक बैलेंस—हर जगह अचानक बढ़ोतरी। आम जनता इसे देखती है, जानती है, लेकिन सवाल पूछने की हिम्मत किसी में नहीं होती। चुनावी एफिडेविट में संपत्ति का विवरण देना कानूनन ज़रूरी है। हालांकि यह केवल कागज़ों तक सीमित रह जाता है।
वास्तविक संपत्ति और उसकी वृद्धि की जांच अक्सर नहीं होती। सत्ता का निजी लाभ उठाना, सरकारी ठेके और लाइसेंस, परिवार और व्यापारिक हित, गुप्त फंडिंग और भ्रष्टाचार—ये सभी कारण हैं, जिनसे नेताओं की संपत्ति इतनी तेज़ी से बढ़ती है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के असमान संपत्ति (Disproportionate Assets) मामले में यह स्पष्ट हुआ कि उनके और उनके करीबी लोगों की संपत्ति उनकी घोषित आय से कहीं अधिक थी। अदालत ने जांच के बाद दोष सिद्ध किया, लेकिन इसमें वर्षों लग गए।
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ADR (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई मंत्री और सांसद हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक हैं। इनमें से कई नेताओं की संपत्ति उनके पारंपरिक आय स्रोतों से संभव नहीं लगती। सत्ता मिलने के बाद नेता अपने परिवार या करीबी व्यापारिक समूहों के माध्यम से सरकारी योजनाओं, निधियों और अवसरों का निजी लाभ उठाते हैं। आम आदमी को अपने अधिकार और न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जबकि नेता निडर होकर अपनी संपत्ति और ताकत बढ़ाते रहते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था आम आदमी के लिए है, नेताओं के लिए नहीं। आम नागरिक को शिकायत दर्ज कराने, एफिडेविट की जांच या संपत्ति के सत्यापन के लिए लंबी, जटिल और खर्चीली प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जबकि सत्ता में बैठे लोग वर्षों तक बिना किसी प्रभावी जांच के संपत्ति बढ़ाते रहते हैं। लोकतंत्र और पारदर्शिता के नाम पर जनता को आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग किसी भी ठोस निगरानी से बचकर दौलत और ताकत इकट्ठा करते हैं।
जब सत्ता ही संपत्ति बढ़ाने का साधन बन जाती है, तब लोकतंत्र केवल एक शब्द बनकर रह जाता है। अब समय आ गया है कि इस सच्चाई को जनता के सामने रखा जाए। नेताओं की संपत्ति, उनके एफिडेविट और न्याय व्यवस्था की असमानता पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। तभी आम आदमी का लोकतंत्र और न्याय पर विश्वास जीवित रह सकता है।
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