
यह आलेख वर्तमान समाज में बढ़ती स्वार्थपरता, संवादहीनता और विश्वास के संकट पर चिंता व्यक्त करता है। साथ ही यह मेहनत, आत्मविश्वास, संस्कार और साहित्य की भूमिका को उजागर करते हुए सकारात्मक जीवन जीने का संदेश देता है।
- स्वार्थी दौर में नेकी की पहचान
- संवादहीन समाज और विश्वास का संकट
- संघर्ष, संस्कार और सफलता का मार्ग
- कलम, कर्म और जीवन के मूल्य
सुनील कुमार माथुर
कहते हैं कि जो नेक होते हैं, वे अनेकों में से एक होते हैं और दिल के करीब होते हैं। चूंकि वर्तमान समय में सभी मतलबी लगते हैं, तभी तो कहते हैं कि दुनिया गोल नहीं, यह तो चार सौ बीस है। क्योंकि उच्च पदों पर आसीन लोग भी धोखाधड़ी करने से बाज नहीं आते हैं। हम समाचार पत्रों में भी पढ़ते हैं कि अपनों ने ही धोखा दे दिया, फिर पीछे रहा ही क्या। किस पर विश्वास करें और किस पर न करें, कुछ भी समझ में नहीं आता।
वर्तमान समय में लोग संवाद की प्रक्रिया से दूर रहने लगे हैं और हर किसी की उंगलियां मोबाइल की स्क्रीन पर दिन भर चलती रहती हैं। नतीजन इंसान अकेला सा हो गया है। वह न जाने क्यों संवाद से कटता जा रहा है, जबकि संवाद ही एकमात्र ऐसा जरिया है जो इंसान को इंसान के पास लाता है। उनमें मैत्री भाव जागृत करता है और अपनापन लाता है। संवाद करते रहने से अनेक छोटी-छोटी समस्याओं का स्वतः ही समाधान हो जाता है। इसलिए हर इंसान को अपनी बात दूसरों के समक्ष खुलकर व्यक्त करनी चाहिए, ताकि इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, क्योंकि खुद पर भरोसा ही हर किसी को जीत दिला सकता है। इसलिए संवाद करते रहिए और मस्त रहिए।
इसलिए व्यक्ति को चुनौतियों से कभी हार नहीं माननी चाहिए, क्योंकि हर चुनौती हमें कुछ नया सीखने का अवसर प्रदान करती है। इसलिए उससे हार नहीं मानें, अपितु मन में यह सोचें कि यह कार्य मुझे नहीं आता है, अगर प्रयास करूं तो कर सकता हूं। बस यही सोच आपको अपने लक्ष्य तक ले जाती है और सफलता हमारे कदम चूमती है। आपका लक्ष्य यह होना चाहिए कि कड़ी मेहनत कर परिवार, समाज व राष्ट्र को श्रेष्ठ परिणाम दें। इसलिए बेकार बैठे रहने के बजाय हर क्षण कुछ नया सीखते रहना चाहिए। हर व्यक्ति के सिर पर ताज होता है, बस जरूरत है उसे पहचानने की और अपने स्वप्नों के अनुरूप जीने की। हर किसी को सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरे करने का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। अगर जीवन में आगे बढ़ना है तो किसी की नकल न करें, अपितु अपनी प्रतिभा को निखारते हुए हर क्षण नया करें।
किसी महापुरुष ने ठीक ही कहा है कि लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। जीवन में मुश्किल कुछ भी नहीं है। जब आप मेहनत करते हैं, तब आपका हुनर, आत्मविश्वास, आपकी मेहनत और आपका ईश्वर आपके साथ होता है, जो बराबर आपका हौसला अफजाई करते रहते हैं। याद रखिए, हमारी कला व संस्कृति ही हमारी पहचान है, जिसे आगे बढ़ाकर हम अपने लक्ष्यों को हासिल करें।
बच्चों के लिए मां एक परी के समान होती है, और बच्चे मां के लिए कितना भी करें, वह हमेशा कम ही है। इसी तरह हमारे माता-पिता, गुरु, सच्चे साधु-संत, बड़े बुजुर्ग हमारे मार्गदर्शक होते हैं। इसलिए अपने से बड़ों को प्रणाम करने से यश और आयु बढ़ती है। इसलिए उन्हें प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते रहना चाहिए। प्रणाम करने से मुफ्त में ही आशीर्वाद मिलता है, इसलिए इस अवसर को खोना नहीं चाहिए, बल्कि बार-बार प्रणाम करना चाहिए। पता नहीं आने वाले समय में कब इस मुफ्त के आशीर्वाद पर टैक्स लग जाए।
साहित्यकार तो साहित्य सृजन का रखवाला है। वह हिमालय की तरह डटा व खड़ा रहता है, क्योंकि उसका जीवन त्यागमय होता है, जो सदैव पाठकों के हित के लिए ही लिखता रहता है। वह समय-समय पर सभी को सत्य से अवगत कराता रहता है। वह हर रोज नई-नई रचनाओं का सृजन करता है, जो आसान कार्य नहीं है, फिर भी नित नए सृजन में वह खोया रहता है और जन-जन तक अपनी आवाज को लेखनी के जरिए पहुंचाता है, तभी वह कलमकार कहलाता है।
लेकिन जब वह अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार और मिलावटखोरी पर अपनी तीखी लेखनी चलाता है, तो समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो यही कहता रहता है कि ज्यादा मुंशी प्रेमचंद न बनें, अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा कि तुम्हें कोई पूछने वाला भी नहीं मिलेगा। लेकिन कलमकार अपनी कलम सत्य के लिए चलाता रहता है। वह कोई मनोरंजन के लिए नहीं लिखता है, अपितु मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक नई दशा व दिशा भी प्रदान करता है।
✍ सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
📍 33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी,
खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर – 342008, राजस्थान






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धन्यवाद
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