
अहंकार और क्रोध के कारण बढ़ती नाराजगी आज इंसान को इंसान से दूर कर रही है। विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद रिश्तों को कमजोर कर देते हैं। धैर्य, विश्वास और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीकर ही रिश्तों और समाज में एकजुटता बनाए रखी जा सकती है।
- नाराजगी से टूटते रिश्ते
- अहंकार और क्रोध की बढ़ती दूरी
- विचारों की भिन्नता और रिश्तों की परीक्षा
- धैर्य, विश्वास और जीवन की सच्चाई
सुनील कुमार माथुर
परमात्मा ने हमें यह इतना सुंदर मानव जीवन दिया है, लेकिन फिर भी हम न जाने क्यों अहंकार में जी रहे हैं। अहंकार व क्रोध की ज्वाला ही इंसान को इंसान से दूर कर रही हैं। हमने बचपन में सुना था कि नमक में खार होता है, जो स्वादिष्ट भोजन को भी कभी-कभी अपनी अधिक मात्रा के कारण बिगाड़ देता है। लेकिन आज नमक की खार समाप्त-सी हो गई है और इंसान में खार आ गई है। तभी तो वह बात-बात में नाराज हो जाता है। अगर आपने किसी का मनचाहा कार्य नहीं किया, उसकी बात पर अमल नहीं किया, किसी की बात में संशोधन करके कार्य किया, तो वे तत्काल नाराज हो जाते हैं।
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नाराजगी रिश्ते का एक हिस्सा है, लेकिन खामोशी उसका अंत। हमें कभी भी जिद नहीं करनी चाहिए, अपितु परिस्थितियों को देखकर कार्य करना चाहिए, चूँकि दूसरों की भी अपनी परेशानियाँ होती हैं। इसलिए समय व परिस्थिति के अनुसार ही कार्य करना पड़े, तो नाराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि रिश्ते बड़े मुश्किल से बनते हैं, मगर टूटते देर नहीं लगती।
जीवन की परीक्षा में कोई अंक नहीं मिलते हैं, लेकिन आपको कोई हृदय से याद करता है, तो समझ लेना कि आप उत्तीर्ण हो गए। जीवन में भांति-भांति के लोग मिलते हैं और सभी के विचार एक-से नहीं होते हैं। यही वजह है कि लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं। व्यक्ति-व्यक्ति में मनभेद हो सकता है, लेकिन मतभेद नहीं होना चाहिए। सभी व्यक्ति ज्ञानी होते हैं, चिंतनशील होते हैं, मगर विचारों की भिन्नता के कारण वे एकजुट नहीं हो पाते हैं। जहाँ विश्वास और विचारों की समानता है, वहीं एकजुटता देखने को मिलती है।
समाज में ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है, जो भगवान की पूजा-अर्चना नहीं करते हैं, लेकिन अपने माता-पिता की सेवा अधिक करते हैं। उनका कहना है कि भगवान अपने भक्तों को सुख और दुःख दोनों देते हैं, लेकिन माता-पिता अपनी संतान को कभी भी दुःख नहीं देते हैं, बल्कि सदैव सुख ही सुख देते हैं। किसी महापुरुष ने बहुत ही सुंदर बात कही है कि परिवार के साथ धैर्य प्यार कहलाता है, औरों के साथ धैर्य सम्मान कहलाता है, स्वयं के साथ आत्मविश्वास और भगवान के साथ आस्था कहलाता है।
इसलिए आत्मविश्वास के साथ जीवन व्यतीत करें और परमात्मा में आस्था रखें, चूँकि वही हमारा पालनहार है। वह हमें जिस हाल में रखता है, हमें उसी हाल में रहना पड़ता है, क्योंकि संघर्ष प्रकृति का आमंत्रण है, जो स्वीकार करता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है। अतः हमें जीवन में हर कठिनाई का सामना धैर्य और सहनशीलता के साथ करना चाहिए।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी,
खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान





