
मेरे विचार : मैं कौन हूं, लक्ष्यविहीन जीवन…! जीवन जिया, अच्छा-बुरा कर्म किया, सीधा-साधा आचरण था या नवाबों की तरह शौक थे, कुल मिलाकर अपने शरीर की ‘नैवर चार्जेबल’ बैटरी को खत्म कर दिया। वृद्धावस्था आई, मरने के नजदीक हो, मौत दरवाजे पर खड़ी है और… राज शेखर भट्ट की कलम से…
कौन हूं मैं, यह शब्द विचारणीय प्रतीत नहीं होता, क्योंकि किसी भी एक आकार की कसौटी तक सीमित समझदार अर्थात मनुष्य जाति ही उपरोक्त शब्द को विचार योग्य बना सकती है। लेकिन मनुष्य जाति के पास यह जानने और समझने के लिए समय ही नहीं है, अतः इस शब्द का होना ही बेकार है। परिणामस्वरूप इस शब्द का अर्थ होना, विचारणीय होना, चिंतनीय होना तो रही दूर की बात।
बहरहाल, यहां यह बात अभी भी स्पष्ट नहीं हो पायी है कि एक आकार की कसौटी तक सीमित समझदार अर्थात मनुष्य जाति के पास स्वयं को जानने का समय नहीं है या जीवन में इतनी व्यस्तता है कि समय मिल नहीं पा रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि यह समझदार जाति यह समझना ही नहीं चाह रही हो ‘वो है कौन’? हो सकता है कि उसके जीवन में, दुनिया में, समाज में, संस्कृति में, दिनचर्या में स्वतः इतने आयाम गढ़ चुके हैं कि उसकी समझने की कसौटी ही एक सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ना चाहती हो। अब क्या कहें, तो रहो अपनी खोखली दुनिया में, जहां आज का नाम तो होता नहीं और हजारों-लाखों वर्षों पुरानी बातों की दुहाई देते रहते हो।
आपके अंदर एक अनोखी बात और भी है, जो आपकी समझदारी को प्रदर्शित करती है। एक औषतन उम्र, जिसे दुनिया यानि समाज मनुष्य की वृद्धावस्था कहता है, वह भी आपने पार कर ली। अभी भी आपको अपना पता नहीं चला कि आखिर क्यों आप दुनिया में आये। आखिर कौन हो आप, क्यों आप पैदा हुये, छोटा या बड़ा जीवन जिया और मर गये। आपने भगवान को तो जान ही लिया, लेकिन आपने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि आप कौन हो। अपने जीवन को किताबी ज्ञान और सामाजिक चित्रण की धारा में बहाते चले गये।
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जीवन जिया, अच्छा-बुरा कर्म किया, सीधा-साधा आचरण था या नवाबों की तरह शौक थे, कुल मिलाकर अपने शरीर की ‘नैवर चार्जेबल’ बैटरी को खत्म कर दिया। वृद्धावस्था आई, मरने के नजदीक हो, मौत दरवाजे पर खड़ी है और अब कहने लगे कि ‘उम्र हो गयी है जीवन देखते-देखते, तुम अगर मेरी जगह होते तो जीवन जीना क्या होता है, तब जानते। मान्यवर ये आप नहीं कह रहे हो, ये आपके दरवाजे पर खड़ी मौत कह रही है। जो आपकी स्थिति है, वही स्थिति सभी जीव-जन्तु, वनस्पति, जीवाणु-विषाणु और एक आकार की कसौटी तक सीमित समझदार अर्थात मनुष्य जाति की भी है, थी और हमेशा होगी।
कब तक…? जब तक आपको किताबी ज्ञान से अधिक आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। जब तक आप सामाजिक ढर्रे पर ही चलते रहेंगे और लक्ष्यविहीन जीवन जीते रहेगा। जिस लक्ष्य की बात की जा रही है, वह इनसानी जीवन को प्रदर्शित नहीं करता और न ही कथित भगवानी जीवन को। यहां उस लक्ष्य की बात की जा रही है, जो शून्य है अर्थात जहां कुछ नहीं है। न आकार-न प्रकार, न रंग-न रूप, न सोच-न समझ, वहां सीमित कुछ नहीं है, सब असीमित है, लेकिन सब कुछ शून्य है। क्योंकि जहां जीवन है, वहां सदियों से चले आ रहे तथ्यविहीन नियमों को मानना जरूरी है। बुद्धिमान मनुष्य की तरह रट्टू तोता बने रहना जरूरी है।
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विषय बडा ही चिंतन मनन योग्य है । मगर आज का इंसान बिना कामकाज के भी काफी व्यस्त हैं और उसकी चिंतन शक्ति न के बराबर हैं । वह बेकार की बहस कर सकता हैं लेकिन चिंतन मनन नहीं । यह आज का कटु सत्य हैं जिसे हम नकार नहीं सकते ।
बहुत ही समसामयिक विषय को चुनकर बड़े ही चिंतन मनन के साथ और मंथन के साथ लिखा गया है l आज का मनुष्य जिस युग में जी रहा है वह एक कठिन दौर है l भागदौड़ भरी जिंदगी l धैर्य रह नहीं गया है l सहनशीलता भी नहीं रही l ऐसे में चिंतित और भागमभाग भरी ज़िन्दगी में सुकून से बैठ कर अगर उस article को पढ़ लिया जाए तो अमल भी किया जा सकता है और ज़िन्दगी को बेहतर ढंग से जिया जा सकता है l
साधुवाद 💐
सत्यवती आचार्य जी का हार्दिक आभार एवं धन्यवाद।
माथुर जी का हार्दिक आभार एवं धन्यवाद।