साहित्य लहर
मॉं तो चारों धाम है…

अशोक राय वत्स
अमृत पिला के हमें,जीवन ये देने वाली,
सुख चैन त्याग कर, लोरी है सुनाती मॉं,
जख्मों को सहला कर,सीने से लगाती वह,
हर एक आहट पे, मुड़ी चली आती मॉं।
उर में समेटे दुःख, अश्कों का सागर पी के,
सुत की खुशी के लिए,सदा मुस्कुराती मॉं।
संकट जो आए कभी,बन जाती रण चण्डी,
आंचल की छांव देके, प्यार से सुलाती मॉं।
थकती नहीं वो कभी,सुख सभी तज देती,
खुश रहे परिवार, मॉं का अरमान है।
रिश्ता नहीं दुनिया में, जननी समान कोई,
मॉं की सेवा करने में, जीवन उद्धार है।
पोथी पढ़ी जग घूमा, मिला बस ज्ञान यही,
चरणों में स्वर्ग वाली, मॉं तो भगवान है।
हमारी गलतियों को, पल में भुलाने वाली,
घर में है देवी रुपी , मॉं तो चारों धाम है।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
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From »अशोक राय वत्सकविAddress »रैनी, मऊ (उत्तर प्रदेश) | Mob : 861966834Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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