
गुजरात की एमबीबीएस महिला डॉक्टर के बयान ने मोदी–योगी सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। नोटबंदी, आधार लिंकिंग और नई प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जनता में भ्रम और असंतोष बढ़ा है। यह आलेख सत्ता के खिलाफ उभरती उस जनभावना को सामने रखता है जो लोकतंत्र और जवाबदेही की मांग कर रही है।
- कट्टर समर्थक से आलोचक तक : एक डॉक्टर की खुली नाराज़गी
- नोटबंदी से आधार तक : जनता क्यों खुद को ठगा महसूस कर रही है
- सरकार चाहिए, तानाशाही नहीं : बढ़ता जन असंतोष
- सवाल पूछना अपराध क्यों बनता जा रहा है?
राज शेखर भट्ट
गुजरात की एक एमबीबीएस महिला डॉक्टर द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ व्यक्त की गई नाराज़गी ने एक बार फिर देश में सत्ता, लोकतंत्र और जनहित के सवालों को तेज कर दिया है। डॉक्टर ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द के समर्थन में बोलते हुए तीखा सवाल उठाया—“योगी मुख्यमंत्री हैं या तानाशाह?”—और यह भी कहा कि वह पहले कट्टर बीजेपी समर्थक थीं, लेकिन अब कभी भाजपा को वोट नहीं देंगी। उनका यह बयान केवल व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि उस व्यापक जनभावना का प्रतीक बनता जा रहा है जो सरकार की नीतियों और कार्यशैली से उपजी है।
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डॉक्टर का आरोप है कि मौजूदा सत्ता में लोकतांत्रिक संवाद और असहमति के लिए स्थान सिमटता जा रहा है। सत्ता से सवाल पूछने वालों को दबाने की प्रवृत्ति बढ़ी है और धार्मिक–सामाजिक संस्थाओं तक को राजनीतिक नियंत्रण में लाने की कोशिशें हो रही हैं। शंकराचार्य जैसे धर्मगुरुओं के समर्थन में उठी आवाज़ें इस बात की गवाही देती हैं कि असंतोष केवल राजनीतिक दायरों तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल से जुड़ी कई नीतियों पर भी युवाओं और आम नागरिकों में नाराज़गी देखी जा रही है।
↓↓ देखें क्या कहती है गुजरात की एक एमबीबीएस महिला डॉक्टर ↓↓
नोटबंदी को लेकर आज भी सवाल कायम हैं—क्या इसकी वाकई जरूरत थी, और क्या इससे जनता को हुए कष्ट का कोई ठोस लाभ मिला? इसके बाद आधार कार्ड को कभी मोबाइल, कभी गैस सिलेंडर, कभी बैंक खाते और फिर पैन कार्ड से जोड़ने की लंबी श्रृंखला ने आम लोगों को लगातार असमंजस और तनाव में रखा। जनता का कहना है कि हर नई घोषणा उन्हें एक और औपचारिक प्रक्रिया में उलझा देती है, जबकि बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।
आलोचकों का यह भी कहना है कि जनता को इन प्रक्रियाओं में व्यस्त रखकर सरकार बड़े सवालों से ध्यान हटाने में सफल रही—जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, स्वास्थ्य और शिक्षा। अब एसआईआर जैसी नई प्रक्रियाओं के नाम पर फिर वही चक्र दोहराया जा रहा है। युवा वर्ग का आरोप है कि सरकार प्रशासनिक बोझ जनता पर डाल रही है, जबकि जवाबदेही सत्ता की होनी चाहिए। महिला डॉक्टर का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वह उस वर्ग से आती हैं जिसे अक्सर “सत्ता का समर्थक” माना जाता रहा है।
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जब ऐसे लोग खुलकर कहते हैं कि उन्हें सरकार चाहिए, तानाशाही नहीं—तो यह लोकतंत्र के लिए चेतावनी की घंटी है। यह आवाज़ बताती है कि समर्थन अंधा नहीं होता; जब वादे पूरे न हों और नीतियां जनविरोधी लगें, तो भरोसा टूटता है। आज सवाल यह नहीं है कि किसी एक नेता या दल की आलोचना हो रही है, सवाल यह है कि क्या देश में असहमति को सम्मान मिलेगा? क्या जनता की परेशानियों को सत्ता गंभीरता से सुनेगी? यदि नहीं, तो ऐसी आवाज़ें और तेज होंगी—क्योंकि लोकतंत्र में चुप्पी नहीं, सवाल ही उसकी असली ताकत होते हैं।








