
2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में देशभर में बड़े पैमाने पर सड़क, पुल और अन्य आधारभूत ढांचे बने। हालांकि कुछ परियोजनाओं में उद्घाटन के बाद ही दरारें, टूट-फूट और गुणवत्ता की शिकायतें सामने आईं। इन घटनाओं ने निगरानी तंत्र, ठेकेदारी व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
- 2014 के बाद विकास परियोजनाएं और उनकी मजबूती पर बहस
- करोड़ों की लागत, लेकिन टिकाऊपन पर संदेह
- पुल, सड़क और एक्सप्रेसवे: दावों के बीच जमीनी हकीकत
- जल्दी उद्घाटन की होड़ या निगरानी की कमी?
वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बुनियादी ढांचे को विकास का प्रमुख आधार बनाया। सड़कों, पुलों, एक्सप्रेसवे, रेलवे परियोजनाओं, जल टंकियों और शहरी ढांचों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। सरकार का दावा रहा कि तेज़ निर्माण से आर्थिक विकास को रफ्तार मिली, लेकिन इसी दौर में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिन्होंने इन निर्माणों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिए। देश के विभिन्न हिस्सों से आई खबरों और सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में यह आरोप लगे कि कहीं सड़कें उद्घाटन के कुछ ही समय बाद उखड़ गईं, कहीं पुलों में दरारें आ गईं, तो कहीं एक्सप्रेसवे पर पहली ही बारिश में गड्ढे दिखने लगे।
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हालांकि यह भी सच है कि हर निर्माण परियोजना के टूटने या खराब होने को सीधे केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, क्योंकि कई योजनाएं राज्य सरकारों और स्थानीय एजेंसियों के माध्यम से क्रियान्वित होती हैं। बावजूद इसके, जनता के मन में यह सवाल लगातार गहराता गया कि करोड़ों-हजारों करोड़ रुपये की लागत से बने ढांचे इतनी जल्दी कमजोर कैसे पड़ रहे हैं। हरियाणा के गुरुग्राम क्षेत्र में बनी सोहना एलिवेटेड रोड, जिसकी लागत लगभग 1500 करोड़ रुपये बताई गई, उद्घाटन के कुछ वर्षों के भीतर ही दरारों और मरम्मत की खबरों में आ गई। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, जिसकी लागत लगभग 14,850 करोड़ रुपये रही, वहां उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद बारिश में सड़क पर गड्ढों की तस्वीरें वायरल हुईं। हालांकि संबंधित विभागों ने इन आरोपों को “सतही क्षति” और “रूटीन मेंटेनेंस” का मामला बताया, लेकिन आम लोगों के बीच भरोसा कमजोर जरूर हुआ।
इसी तरह कई जगह रेलवे ओवरब्रिज, ग्रामीण सड़कों और जलापूर्ति से जुड़ी संरचनाओं को लेकर भी सवाल उठे। कुछ मामलों में जांच के आदेश दिए गए, तो कुछ में ठेकेदारों को नोटिस जारी हुए। बावजूद इसके, यह आलोचना लगातार सामने आती रही कि ठेकेदारी व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं होती और निर्माण की गुणवत्ता पर निगरानी ढीली रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या सिर्फ किसी एक सरकार या कार्यकाल की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है। जल्दी उद्घाटन कर राजनीतिक श्रेय लेने की होड़, समय पर गुणवत्ता परीक्षण न होना और दोषी पाए जाने पर कठोर कार्रवाई का अभाव—ये सभी कारण निर्माणों की उम्र और मजबूती पर असर डालते हैं। कैग (CAG) की रिपोर्टों में भी समय-समय पर विभिन्न परियोजनाओं में अनियमितताओं और लागत बढ़ने जैसे मुद्दे उठते रहे हैं, लेकिन उन पर ठोस कार्रवाई सीमित ही दिखती है।
सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो और तस्वीरें भ्रामक होती हैं या पुराने निर्माणों की होती हैं, जिन्हें नई परियोजनाओं से जोड़ दिया जाता है। यह बात भी सही है कि हर आरोप सही नहीं होता। लेकिन जिन मामलों में वास्तव में खामियां सामने आईं, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता पर उतना ही ध्यान देना जरूरी है। अंततः, जनता का सवाल सरल है—करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अगर सड़क, पुल या अन्य ढांचा टिकाऊ नहीं है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक ठेकेदारों, इंजीनियरों और निगरानी एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे सवाल उठते रहेंगे। विकास की रफ्तार तभी सार्थक मानी जाएगी, जब उसके साथ मजबूती, पारदर्शिता और भरोसा भी कायम हो।
क्या कहते हैं घर-घर मोदी के आंकड़े-
1️⃣ सोहना एलिवेटेड रोड, गुरुग्राम (हरियाणा)
- लागत: लगभग ₹1500 करोड़
- स्थिति: उद्घाटन के 2–3 साल के भीतर सड़क पर दरारें
- सरकारी पक्ष: “रूटीन मेंटेनेंस”
- सवाल: इतनी जल्दी संरचनात्मक खामियां क्यों?
- स्थिति: पूरी तरह ढहना नहीं, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल
2️⃣ बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे (उत्तर प्रदेश)
- लागत: लगभग ₹14,850 करोड़
- आरोप: उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद बारिश में सड़क पर गड्ढे
- स्थिति: वीडियो और तस्वीरें वायरल
- सरकारी पुष्टि: नहीं
⚠️ यह मामला सोशल मीडिया आधारित है, पूर्ण आधिकारिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं.
3️⃣ रेलवे ओवरब्रिज, संबलपुर (ओडिशा)
- लागत (दावा): ₹60 करोड़
- आरोप: उद्घाटन के एक दिन बाद दरारें
- स्थिति: स्थानीय स्तर पर चर्चा, सोशल मीडिया पोस्ट
⚠️ राष्ट्रीय स्तर की पुष्टि उपलब्ध नहीं









