
मणिकर्णिका घाट रेनोवेशन के दौरान मूर्तियों को लेकर विवाद सामने आया है, जिससे श्रद्धालुओं में नाराज़गी है। प्रधानमंत्री के सांस्कृतिक संरक्षण संबंधी पुराने बयानों और मौजूदा घटनाक्रम के बीच अंतर पर सवाल उठ रहे हैं। यह मामला अब काशी के विकास बनाम सांस्कृतिक विरासत संरक्षण की बहस का प्रतीक बन गया है।
- “मणिकर्णिका घाट: पीएम के बयान और ज़मीनी हकीकत में अंतर क्यों?”
- “काशी का विकास या विरासत का नुकसान? मणिकर्णिका विवाद समझिए”
- “अहिल्याबाई होल्कर की मूर्तियां और सवालों में घिरता रेनोवेशन”
- “विकास के नाम पर विरासत? मणिकर्णिका घाट से उठते सवाल”
राज शेखर भट्ट
वाराणसी के विश्वप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर चल रहे रेनोवेशन (जीर्णोद्धार) कार्य के दौरान महारानी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी मूर्तियों और मंदिर संरचनाओं को लेकर विवाद गहरा गया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में मूर्तियों को ज़मीन पर पड़े हुए दिखाए जाने के बाद तीर्थ पुरोहितों, श्रद्धालुओं और सांस्कृतिक संगठनों में नाराज़गी फैल गई। अहिल्याबाई होल्कर चैरिटी ट्रस्ट ने इस घटना को काशी की सांस्कृतिक विरासत पर आघात बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा है।
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ट्रस्ट का कहना है कि जिस काशी को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की बात प्रधानमंत्री अपने पूर्व बयानों में करते रहे हैं, उसी काशी में ऐतिहासिक मूर्तियों के साथ इस तरह का व्यवहार गंभीर सवाल खड़े करता है। वहीं, प्रशासन और मुख्यमंत्री के हवाले से जारी बयानों में कहा गया है कि किसी भी मूर्ति को तोड़ा नहीं गया है, बल्कि विकास कार्य के दौरान उन्हें सुरक्षित रूप से हटाया गया है और पुनः स्थापित किया जाएगा। प्रशासन का तर्क है कि रेनोवेशन का उद्देश्य काशी की गरिमा बढ़ाना है, न कि उसकी विरासत को नुकसान पहुँचाना।
यह विवाद अब केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि “विकास बनाम विरासत” की बहस में बदल गया है। एक ओर प्रधानमंत्री के वे पुराने बयान हैं, जिनमें काशी को सनातन परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बताया गया, तो दूसरी ओर ज़मीनी तस्वीरें हैं, जो आम लोगों के मन में असमंजस और अविश्वास पैदा कर रही हैं। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या विकास की प्रक्रिया में आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? मणिकर्णिका घाट का यह विवाद अब उसी प्रश्न का प्रतीक बन चुका है।








