
महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रस्तुत यह कुमाऊनी रचना भगवान शिव की महिमा, करुणा और पालनहार स्वरूप का वर्णन करती है। कैलाशवासी महादेव, केदार, बागनाथ और जागेश्वर धाम की वंदना के माध्यम से लोक आस्था को अभिव्यक्त किया गया है। रचना में शिव के नीलकंठ रूप और भक्तों के प्रति उनकी कृपा का भावपूर्ण चित्रण है।
- कुमाऊनी बोली में महादेव का गुणगान
- जय शंकर देवा: लोकभावना की शिव स्तुति
- कैलाशवासी महादेव को समर्पित रचना
- कुमाऊँ की धरती से गूंजा शिव महिमा का स्वर
भुवन बिष्ट
(रानीखेत), उत्तराखंड
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जै जै शंकर देवा, महादेव छा महान,
भक्त ऐंरीं द्वार, सब करनीं गुणगान।
त्रिकाल दर्शी तुम छा, देव त्रिनेत्र धारी छा,
भक्तों कैं लाज धरणी, शीश गंग जटा धारी छा।
कैलाश पर्वत में तुमुल, आसन लगाई छौ,
तन में भभूति लगाई, ब्याघ्र चर्म लिपटाई छौ।
संग माता पार्वतीज्यू, पुत्र गणपति लाला छन,
हाथ में त्रिशूल सजीं, गले नागों की माला छन।
जै जै शंकर देवा, महादेव छा महान,
भक्त ऐंरीं द्वार, सब करनीं गुणगान।
अमरनाथ तुमौर वासा, जय जय बाबा केदार,
जय बागेश्वर बागनाथ, जागेश्वर शंभू दरबार।
जटा बसी छौ गंग तुमरी, शीश चन्द्र त्रिशूल धारी,
जै हो दयालु महादेव, तुम छाँ देव पालनहारी।
शिवालय छौ धाम तुमौर, जय जय कैलाशवासी,
आयूँ मैं देव त्यौर शरणा, शंभू मैं छूँ त्यौर विश्वासी।
जै जै शंकर देवा, महादेव छा महान,
भक्त ऐंरीं द्वार, सब करनीं गुणगान।
अन्न-धनक भकार भरिये, रोग-दोष कैं दूर करिया,
जन-जन खुशहाल बणांया, लाज देव तुम धरिया।
घट-घट महादेव निवासी, जै शंभू शिवालय वासी,
नंदी गण साथ रौंनी, जय जय शंभू कैलाशवासी।
सुर जनौ कै रक्षा करछा, देव करौ छौ विषपान,
नीलकंठ नाम पड़छौ, हिमगिरी में आसन ध्यान।
जै जै शंकर देवा, महादेव छा महान,
भक्त ऐंरीं द्वार, सब करनीं गुणगान।









