
आलेख में महानता के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि सच्चाई, संयम, त्याग, विनम्रता और सेवा भाव ही व्यक्ति को ऊँचा बनाते हैं। अभिमान से दूर रहकर सकारात्मक सोच और विश्वास के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। लेखक ने व्यवहार, अनुभव और रिश्तों की गरिमा को सफल और आनंदमय जीवन का आधार बताया है।
- सच्चाई और संयम से ही मिलती है सच्ची महानता
- अभिमान नहीं, विनम्रता बनाती है व्यक्तित्व को ऊँचा
- विश्वास और सकारात्मक सोच से मिलती है सफलता
- सेवा, त्याग और धैर्य से संवरता है जीवन
सुनील कुमार माथुर
महान बनना कोई आसान काम नहीं है। महान बनने के लिए न केवल सच्चाई के मार्ग पर ही चलना पड़ता है, अपितु संयम, त्याग, परोपकार, सहनशीलता, धैर्य, करुणा, ममता व वात्सल्य जैसे आदर्श गुणों को भी आत्मसात करना होता है, जो हर किसी के बूते की बात नहीं है। बड़े बुजुर्गों का कहना है कि किसी व्यक्ति का महान बनना सामान्य बात है, लेकिन उसके महान बनने के बाद उसका सामान्य रहना बहुत बड़ी बात है। इसलिए सच्चाई के मार्ग पर निस्वार्थ भाव से चलें। आपको सफलता अवश्य ही हासिल होगी। जिसका मन भले ही बाहर से कितना भी कठोर क्यों न हो, भीतर से नारियल की गिरी की तरह निर्मल और साफ होना चाहिए। क्योंकि हमारे प्रभु तो भक्तों के भाव के भूखे हैं, न कि आपके द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद, भोग या नोटों की गड्डियों से।
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व्यवहार में बच्चा होना, काम में जवान होना और अनुभव में वृद्ध होना किसी भी व्यक्ति को सफलता की ऊँचाई तक पहुँचाता है। हम भले ही कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ, लेकिन अपने माता-पिता के सामने हमेशा बच्चे ही रहेंगे। इसी प्रकार गुरु के समक्ष शिष्य ही रहेंगे। हमें अपने ज्ञान पर कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि अभिमान ही विनाश का कारण बनता है, जो हमें पूरी तरह से अलग-थलग कर देता है। इसलिए जीवन में अनुभवी लोगों का कभी भी साथ मत छोड़िए, भले ही उनकी आयु हमसे कम या अधिक क्यों न हो। अनुभव का लाभ अवश्य ही लेना चाहिए।
बड़े बुजुर्गों का कहना है कि अभ्यास हमें बलवान बनाता है, दुःख हमें इंसान बनाता है और हार हमें विनम्रता सिखाती है। वहीं जीत हमारे व्यक्तित्व को निखारती है, लेकिन सिर्फ विश्वास ही है जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसलिए अपने आप को सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत कीजिए। अच्छी सोच ही हमारे व्यक्तित्व में निखार लाती है। जो लोग दूसरों की निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहते हैं, उनका ईश्वर जरूर कल्याण करता है, क्योंकि ईश्वर जानता है कि वह दूसरों के कल्याण के चक्कर में अपने आपको भूलता जा रहा है।
जीवन में हमेशा सबसे श्रेष्ठ व्यवहार रखें। किसी के साथ ऐसा व्यवहार न करें कि किसी की आत्मा आहत हो। मन को ऐसा रखें कि आपके कथन व व्यवहार से किसी को बुरा नहीं लगे और दिल ऐसा रखें कि किसी को दुःखी न करे, व रिश्ता ऐसा रखें कि उसका कभी भी अंत न हो। तभी आनंदमय जीवन व्यतीत कर सकते हैं। तनावमय जीवन जीना भी कोई जीना है? कहते हैं कि एक समय ऐसा था जब लोगों के पास पैसा नहीं था, लेकिन प्रगाढ़ आपसी भाईचारा था; मगर आज लोगों के पास अपार धन-दौलत है, लेकिन आपसी भाईचारा नहीं है। यह कैसी विडंबना है। अतः शांत रहें, मस्त रहें और स्वस्थ रहें।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान







