
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच (स्वतंत्र लेखक व पत्रकार), जोधपुर, राजस्थान
कहने को तो डॉक्टर इस धरती के भगवान कहलाते हैं, क्योंकि भगवान के बाद रोगी का उपचार करने वाले वही हैं। लेकिन अधिकांश डॉक्टरों ने रोगी को दुधारू गाय समझ लिया है और यही वजह है कि प्राइवेट अस्पतालों में उपचार कराना हर किसी के बस की बात नहीं रह गया है। बिना वजह की जांचें लिखकर धन कमाया जा रहा है, लेकिन सरकार का उन पर कोई अंकुश नहीं है। यही कारण है कि चिकित्सा सेवा के नाम पर वे कौड़ियों के भाव में सरकार से जमीन लेकर अस्पताल बनाते हैं और फिर लूट का जो सिलसिला शुरू होता है, वह हर साल उनके अस्पताल के विस्तार के रूप में दिखाई देता है। उपचार के नाम पर जनता-जनार्दन की जमीन-जायदाद बिक जाती है, लेकिन सरकार का उन पर कोई नियंत्रण नहीं है।
सरकार ने कहने को सरकारी अस्पताल खोल रखे हैं, लेकिन वहां सुविधाएं नाम की कोई चीज नहीं है। शहर बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों के लिए जगह नहीं है। वार्ड में रोगी की देखभाल करने वाले के बैठने के लिए हर बेड पर स्टूल तक नहीं है। रोगी को जांच के लिए ट्रॉली भी परिजन को ही लानी-लेजानी पड़ती है। कहीं जाले लगे हैं, तो कहीं जूते-चप्पल रखने की जगह नहीं है। परिजनों के लिए रात्रि में रोगी की सेवा हेतु सोने की कोई व्यवस्था नहीं है। हां, खानापूर्ति के नाम पर रुपए में सवा चार आने की सुविधा जरूर है, जो मात्र औपचारिकता है। भला ऐसे माहौल में रोगी कैसे ठीक हो सकता है! उल्टा, रोगी की सेवा करने वाले भी बीमार पड़ जाते हैं, क्योंकि सारी भागदौड़ उन्हें ही करनी पड़ती है।
थोड़ी-थोड़ी देर में दवा की पर्ची, जांच की पर्ची देकर रोगी के परिजनों को परेशान कर दिया जाता है। सरकार एक ओर निशुल्क उपचार की बात करती है, तो दूसरी ओर आयुष्मान कार्ड जैसे कार्ड की मांग करती है। जब उपचार निशुल्क है, तब सारी दवाएं और जांचें भी हर रोगी को निशुल्क मिलनी चाहिए। कैसा कार्ड? कैसी झंझट? सरकार को चिकित्सा सेवा में व्यापक सुधार करना चाहिए। छुट्टी के दिन भी डॉक्टरों को आधा दिन सेवाएं देने के लिए पाबंद किया जाए, क्योंकि मोटी तनख्वाह लेने के बावजूद छुट्टी के दिन कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता। सरकार चिकित्सा सेवा में आवश्यक सुधार करे, रोगियों की सच्चे मन से सेवा सुनिश्चित करे तथा कार्ड की औपचारिकता समाप्त कर पूरी तरह निशुल्क उपचार उपलब्ध कराए। अस्पतालों में जांच के लिए ट्रॉली, परिजनों के बैठने के लिए पर्याप्त बेंच और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
अस्पताल जैसी सेवा को केवल भामाशाहों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यदि भामाशाह ने दीवार घड़ी दी है, तो सेल लगाना अस्पताल का काम होना चाहिए। यदि भामाशाह ने व्हीलचेयर, पंखा या एसी भेंट किया है, तो उसकी देखभाल और मरम्मत का खर्च अस्पताल के बजट से होना चाहिए। लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। समस्या समाधान चाहती है, न कि दलगत राजनीति।








