
देश की दिशा बदलने वाले विचार अक्सर प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, खेतों और उद्योगों से आते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था उन विचारों को लागू करने और उन्हें व्यापक स्तर पर पहुँचाने में मदद करती है, परंतु मूल विचार का जन्म अक्सर किसी वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी या सामाजिक कार्यकर्ता के मन में होता है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रशासनिक सेवा और नवाचार की भूमिका अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक हैं।
- देश बदलने की असली ताकत: नवाचार या प्रशासन?
- आईएएस से आगे भी हैं राष्ट्र निर्माण के रास्ते
- युवाओं के सपनों का दायरा क्यों हो रहा सीमित
- प्रशासन और नवाचार: दोनों से बनता है मजबूत राष्ट्र
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं रह गई है, बल्कि यह आज के युवाओं के लिए प्रतिष्ठा, शक्ति और सामाजिक सम्मान का प्रतीक बन चुकी है। हर वर्ष लाखों युवा इस परीक्षा की तैयारी में जुटते हैं और इसके साथ-साथ एक विशाल कोचिंग उद्योग भी खड़ा हो चुका है, जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये आँकी जाती है। माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही यह सपना दिखाने लगते हैं कि वे बड़े होकर प्रशासनिक अधिकारी बनें। समाज में भी प्रशासनिक सेवाओं को इतनी प्रतिष्ठा दी जाती है कि यह कई युवाओं के लिए जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है।
इसी वातावरण के बीच हाल ही में एक प्रसिद्ध शिक्षक का एक वक्तव्य व्यापक चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवा का अधिकारी देश को नहीं बदल सकता। उनके अनुसार प्रशासनिक अधिकारी एक अच्छे कार्यान्वयनकर्ता होते हैं, जिनका मुख्य कार्य सरकार की नीतियों और योजनाओं को जमीन पर लागू करना होता है। लेकिन जब बात नए विचारों, बड़े परिवर्तन और ऐतिहासिक उपलब्धियों की आती है, तो इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जहाँ किसी प्रशासनिक अधिकारी ने कोई क्रांतिकारी दिशा दी हो। यह कथन कई लोगों को कठोर लगा, परंतु इसने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है—क्या सचमुच देश का भविष्य केवल प्रशासनिक सेवाओं से तय होता है या उसके पीछे वैज्ञानिकों, विचारकों और नवाचार करने वालों की बड़ी भूमिका होती है?
यदि हम भारत के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएँगे कि देश को दिशा देने वाले कई बड़े परिवर्तन प्रशासनिक ढाँचे से बाहर के लोगों ने किए। भारत का परमाणु कार्यक्रम हो या अंतरिक्ष अनुसंधान, हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति—इन सभी के पीछे दूरदर्शी वैज्ञानिकों और सामाजिक उद्यमियों की भूमिका रही है। होमी जे. भाभा ने भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी और यह दिखाया कि विज्ञान के माध्यम से राष्ट्र की सुरक्षा और प्रतिष्ठा को मजबूत किया जा सकता है। विक्रम साराभाई ने अंतरिक्ष अनुसंधान की शुरुआत की और आज भारत विश्व के अग्रणी अंतरिक्ष देशों में गिना जाता है।
इसी प्रकार ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मिसाइल कार्यक्रम को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और भारत को सामरिक रूप से मजबूत बनाया। कृषि क्षेत्र में एम.एस. स्वामीनाथन ने हरित क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। वहीं वर्गीज़ कुरियन ने अमूल आंदोलन के माध्यम से दुग्ध उत्पादन में क्रांति लाकर लाखों किसानों की आर्थिक स्थिति बदल दी। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि देश की दिशा बदलने वाले विचार अक्सर प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, खेतों और उद्योगों से आते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था उन विचारों को लागू करने और उन्हें व्यापक स्तर पर पहुँचाने में मदद करती है, परंतु मूल विचार का जन्म अक्सर किसी वैज्ञानिक, शिक्षक, उद्यमी या सामाजिक कार्यकर्ता के मन में होता है।
फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि प्रशासनिक सेवाओं का महत्व कम नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियों को लागू करने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जनता तक योजनाओं को पहुँचाने के लिए सक्षम प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यकता होती है। यदि कोई महान वैज्ञानिक कोई नई तकनीक विकसित करता है, तो उसे समाज तक पहुँचाने के लिए प्रशासनिक ढाँचे की सहायता आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए हरित क्रांति का विचार वैज्ञानिकों ने दिया, लेकिन उसे देश भर में लागू करने के लिए प्रशासनिक मशीनरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसी प्रकार दुग्ध सहकारिता आंदोलन को भी व्यापक रूप देने में सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों ने सहयोग किया। समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाज किसी एक ही पेशे को सफलता का अंतिम प्रतीक मानने लगता है। भारत में प्रशासनिक सेवाओं को लेकर यही स्थिति देखने को मिलती है। अनेक प्रतिभाशाली छात्र, जो विज्ञान, शोध, उद्यमिता या कला के क्षेत्र में अद्भुत योगदान दे सकते हैं, वे भी अंततः प्रशासनिक सेवा की तैयारी में लग जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रतिभा का प्रवाह कम हो जाता है। देश को जितनी आवश्यकता अच्छे प्रशासकों की है, उतनी ही आवश्यकता उत्कृष्ट वैज्ञानिकों, शिक्षकों, चिकित्सकों, अभियंताओं और उद्यमियों की भी है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रशासनिक सेवा को अक्सर शक्ति और अधिकार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। समाज में यह धारणा बन गई है कि प्रशासनिक अधिकारी बनते ही व्यक्ति के पास अपार शक्ति आ जाती है। यह धारणा युवाओं को आकर्षित करती है, लेकिन इससे सेवा की वास्तविक भावना पीछे छूट जाती है। प्रशासनिक सेवा का मूल उद्देश्य समाज की सेवा करना और जनता की समस्याओं का समाधान करना है, न कि केवल अधिकारों का उपयोग करना। यदि युवा केवल शक्ति और प्रतिष्ठा के आकर्षण में इस क्षेत्र में आते हैं, तो वे प्रशासनिक व्यवस्था को उतना प्रभावी नहीं बना पाते जितनी अपेक्षा की जाती है। खान सर का वक्तव्य इसी मानसिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उनका उद्देश्य शायद प्रशासनिक सेवाओं की आलोचना करना नहीं, बल्कि युवाओं को यह समझाना है कि राष्ट्र निर्माण के अनेक रास्ते होते हैं। यदि कोई युवा वैज्ञानिक बनता है, नई तकनीक विकसित करता है, कोई सामाजिक मॉडल बनाता है या कोई सफल उद्योग स्थापित करता है, तो उसका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी प्रशासनिक अधिकारी का। वास्तव में कई बार ऐसे नवाचार ही प्रशासनिक नीतियों को दिशा देते हैं।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के विकास के लिए बहुआयामी प्रतिभाओं की आवश्यकता है। केवल प्रशासनिक सेवा के माध्यम से ही देश का संपूर्ण विकास संभव नहीं है। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य और संस्कृति—इन सभी क्षेत्रों में समान रूप से प्रतिभा और समर्पण की जरूरत है। यदि देश के अधिकांश प्रतिभाशाली युवा केवल एक ही लक्ष्य की ओर दौड़ने लगेंगे, तो अन्य क्षेत्रों में संतुलन बिगड़ सकता है। आज दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नए-नए अवसर और चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। भारत यदि वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनना चाहता है, तो उसे शोध और नवाचार पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि युवा नई खोजों और प्रयोगों की ओर भी उतनी ही रुचि से बढ़ें, जितनी रुचि वे प्रशासनिक सेवाओं में दिखाते हैं।
यह भी आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था छात्रों को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक सीमित न करे, बल्कि उन्हें जिज्ञासु, रचनात्मक और प्रयोगशील बनाए। यदि विद्यालय और विश्वविद्यालय छात्रों में नवाचार की भावना विकसित करेंगे, तो वे केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए भी प्रेरित होंगे। इसी प्रकार समाज को भी यह समझना होगा कि सफलता का अर्थ केवल एक प्रतिष्ठित पद प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपने कार्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। अंततः यह कहना उचित होगा कि प्रशासनिक अधिकारी और नवाचार करने वाले दोनों ही राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। एक ओर जहाँ प्रशासनिक व्यवस्था नीतियों को लागू करती है और व्यवस्था बनाए रखती है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक, विचारक और उद्यमी नए रास्ते खोलते हैं। यदि इन दोनों के बीच संतुलन और सहयोग हो, तो देश की प्रगति अधिक तेज और स्थायी हो सकती है।
युवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपनी रुचि, क्षमता और जुनून के अनुसार अपना मार्ग चुनें। यदि किसी को प्रशासनिक सेवा में रुचि है, तो उसे पूरी निष्ठा के साथ उस दिशा में प्रयास करना चाहिए। लेकिन यदि कोई युवा विज्ञान, शोध, उद्यमिता या कला के क्षेत्र में कुछ नया करना चाहता है, तो उसे भी उतना ही सम्मान और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। राष्ट्र निर्माण का कार्य किसी एक पद या पेशे तक सीमित नहीं होता। यह एक सामूहिक प्रक्रिया है, जिसमें हर क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण होता है। जब समाज प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ नवाचार, शोध और उद्यमिता को भी समान महत्व देगा, तभी भारत वास्तव में ज्ञान, विज्ञान और प्रगति की दिशा में एक सशक्त राष्ट्र बन सकेगा।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
हिसार (हरियाणा)






